श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कभी भारतवर्ष की मजबूत समृद्ध अर्थव्यवस्था का आधार रहा गौवंश देखते ही देखते भ्रमित मानवता के अहम, अहंकार महत्वकांक्षा स्वार्थपूर्ति और धन लालसा के चलते कभी इतना जघन्य अन्याय, अत्याचार झेलने पर मजबूर होगा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। गौवंश मजबूत अर्थव्यवस्था का सिर्फ आधार ही नहीं बल्कि स्वस्थ तंदुरूत मानव जीवन के लिये आध्यात्म न होकर एक सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान रहा है और आज भी हो सकता है।
आज जब कोरोना या बैक्टिरिया वायरस जनित जानलेवा बीमारी से बचाव की पहली शर्त मानव शरीर में मजबूत प्रतिरोधक क्षमता नियमित साफ-सुथरा कीटाणु बैक्टिरिया वायरस मुक्त वातावरण और मानव शरीर है जिसे पौष्टिक भोजन और सेनेट्राईजेशन के लिये एन्टीवाइटिक्स की आवश्यकता है जो आज का विज्ञान और ज्ञान कहता है, तो निश्चित ही उस मानव सभ्यता भूभाग ने स्वयं ही समृद्ध, स्वस्थ जीवन का अधिकार आज खो दिया है और अपने ही कर्म कुकर्मो से अपना जीवन कन्टोको से भर लिया है। परिणाम कि कोरोना के कहर से समूची मानव सभ्यता कांप रही है और वह स्वस्थ समृद्ध भूभाग भी घरों में बंद हाल बेहाल है जो कभी अपने स्वास्थ्य और समृद्धि को लेकर खुशहाल जीवन को लेकर इठलाता नहीं थकता। मगर सबसे बडे दुख-दर्द और शर्म की बात तो उस समृद्ध, खुशहाल भूभाग और उन मानवों के लिये यह है कि जिस मानव, जीवन की निःस्वार्थ सेवा प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम से सृजन में सृष्टि अनुरूप वह बेजुबान गौवंश पशु योनी में होने के बावजूद निष्ठापूर्ण करता रहा जिसे गौपालन के रूप में मानव अपनी आर्थिक और स्वास्थ्य की समृद्धि मानता था उस अमृतदायिनी के नैसर्गिक अधिकारों का हनन हो उन पर जघन्य अन्याय, अत्याचारों का पहाड इस चमक-धमक भरी दुनिया की ग्लोबल संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों के चलते टूट पडा और वह जिस मानव समाज की पीढी दर पीढी निःस्वार्थ सेवा करता आया उसी मानव सभ्यता ने उसे अन्याय, तिरस्कार और अत्याचार का पात्र बना दिया वह भी एक ऐसे तपस्वी भूभाग पर जहां श्रीकृष्ण भगवान स्वरूप पूजे जाते है जिनके द्वारा कही गई गीता का भागवत के माध्यम से श्रवण कर लोग अपना परलोक सुधारते है भगवान कृष्ण के प्रेम में जहां भक्त अपना परलोक सुधारने या इस लोक में कुछ पाने सबकुछ लुटा देना चाहता है उन्हीं प्रभु कृष्ण ने भी कभी गौवंश की अनन सेवा कर उस गौदौली में अठखेलियां तक की है। अगर यों कहे कि कृष्णकाल में दूध, दही, छाछ, मक्खन, मानव जीवन व अर्थ का मजबूत आधार था उन्हीं भगवान की कर्मस्थली भारतवर्ष के भूभाग पर उस गौवंश के साथ मानव जगत द्वारा कितना जघन्य अत्याचार, अपमान आखिर क्यों। एक समृद्ध विरासत के हम उत्तराधिकारी कैसे भूल गये कि प्रकृति से प्राप्त जल, जंगल, झरने, नदी, पोखर, तालाबों का जल और जंगलों की घास और खेतों में जलाई जाने वाली पराली ठूटों का आहार लें मानव जगत की न जाने कितने पीढियों की पियोसी दूध, दही, मक्खन, छांछ का आहार फोकट में उपलब्ध करा उन्हें स्वस्थ समृद्ध, खुशहाल बनाती रही तो वहीं दूसरी ओर गोबर से ईधन और उस ईधन से सेनेट्राइज भोजन एवं हर सात दिन में समूचे घरों, आंगनों का सेनेट्राईजेशन गौ-मूत्र से औषधी तथा मरणो उपरान्त पशु-पक्षियों का भोजन खाल से वस्त्र तो हड्डी से अन्य उत्पाद बनते थे। मानव जगत को बगैर कुछ लिये बहुत कुछ देने वाली अमृतदायिनी कब मानव जगत के लिये अनुपयोगी हो तिरस्कार का पात्र बन गई पता ही नहीं चला। जहां वन अधिनियम में गौवंश से जंगलों की घास तो वहीं सत्ता, मानव के अहम अहंकार और स्वार्थो में उससे उसकी चरनोई भूमि, तालाब तथा बोर टियूबेल समृद्ध संस्कृति ने पोखल, तालाब सुखा दिये। आखिर क्या बिगाडा था इस मानव सभ्यता का अमृतदायिनी, औषध दायिनी गौवंश ने जो उन्हें सडकों और जंगलों में या तो जिन्दा मरने या फिर कसाई खानों में बिचने लावारिश छोड दिया गया। जबकि अगर जानकारों की माने तो गाय के प्रथम दूध से विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तो वहीं उसके दूध, दही, मक्खन, छांछ की तासिर न तो मानव के आध्यात्म और न ही विज्ञान से छिपी है। वहीं गोबर के कंडों के ईधन और राख और गोबर की लिपाई और गौ-मूत्र के ओषधीय गुणों तथा जंगलों को पोषित करने वाले जैविक खाद को कौन सा आध्यात्म विज्ञान नहीं जानता। मगर मानव सभ्यता ने अपने क्षणिक स्वार्थ ने अपने अहम अहंकार धन पिपासुओं की लालसा ने सबकुछ तबाह कर दिया। परिणाम कि आज जब हमारी मानव सभ्यता अपनी सभ्यता को तिलांजली दें ग्लोबल दौर में है तो कोरोना जैसी महामारी तो सिर्फ शुरूआत भर कही जा सकती है। इससे आगे न जाने इस मानव सभ्यता को क्या-क्या और देखना पडेगा फिलहाल यह भविष्य के गर्भ में है। काश आज भी बहुत देर नहीं हुई है जितनी जल्दी मानव जगत, सत्ता, सरकार सत्य को समझ लें उतना बेहतर होगा क्योंकि जो वर्तमान में घट रहा है या पूर्व में घट गया वह यथार्थ है। कोई आध्यात्म, आस्था नहीं कहीं ऐसा न हो कि मानव संस्कृति में कोरोना जैसी महामारी के चलते अन्धा अन्धे से पूछने लगे कि भाई मुझे तुम्हारा चेहरा क्यों नहीं दिख रहा है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कभी भारतवर्ष की मजबूत समृद्ध अर्थव्यवस्था का आधार रहा गौवंश देखते ही देखते भ्रमित मानवता के अहम, अहंकार महत्वकांक्षा स्वार्थपूर्ति और धन लालसा के चलते कभी इतना जघन्य अन्याय, अत्याचार झेलने पर मजबूर होगा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। गौवंश मजबूत अर्थव्यवस्था का सिर्फ आधार ही नहीं बल्कि स्वस्थ तंदुरूत मानव जीवन के लिये आध्यात्म न होकर एक सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान रहा है और आज भी हो सकता है।आज जब कोरोना या बैक्टिरिया वायरस जनित जानलेवा बीमारी से बचाव की पहली शर्त मानव शरीर में मजबूत प्रतिरोधक क्षमता नियमित साफ-सुथरा कीटाणु बैक्टिरिया वायरस मुक्त वातावरण और मानव शरीर है जिसे पौष्टिक भोजन और सेनेट्राईजेशन के लिये एन्टीवाइटिक्स की आवश्यकता है जो आज का विज्ञान और ज्ञान कहता है, तो निश्चित ही उस मानव सभ्यता भूभाग ने स्वयं ही समृद्ध, स्वस्थ जीवन का अधिकार आज खो दिया है और अपने ही कर्म कुकर्मो से अपना जीवन कन्टोको से भर लिया है। परिणाम कि कोरोना के कहर से समूची मानव सभ्यता कांप रही है और वह स्वस्थ समृद्ध भूभाग भी घरों में बंद हाल बेहाल है जो कभी अपने स्वास्थ्य और समृद्धि को लेकर खुशहाल जीवन को लेकर इठलाता नहीं थकता। मगर सबसे बडे दुख-दर्द और शर्म की बात तो उस समृद्ध, खुशहाल भूभाग और उन मानवों के लिये यह है कि जिस मानव, जीवन की निःस्वार्थ सेवा प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम से सृजन में सृष्टि अनुरूप वह बेजुबान गौवंश पशु योनी में होने के बावजूद निष्ठापूर्ण करता रहा जिसे गौपालन के रूप में मानव अपनी आर्थिक और स्वास्थ्य की समृद्धि मानता था उस अमृतदायिनी के नैसर्गिक अधिकारों का हनन हो उन पर जघन्य अन्याय, अत्याचारों का पहाड इस चमक-धमक भरी दुनिया की ग्लोबल संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों के चलते टूट पडा और वह जिस मानव समाज की पीढी दर पीढी निःस्वार्थ सेवा करता आया उसी मानव सभ्यता ने उसे अन्याय, तिरस्कार और अत्याचार का पात्र बना दिया वह भी एक ऐसे तपस्वी भूभाग पर जहां श्रीकृष्ण भगवान स्वरूप पूजे जाते है जिनके द्वारा कही गई गीता का भागवत के माध्यम से श्रवण कर लोग अपना परलोक सुधारते है भगवान कृष्ण के प्रेम में जहां भक्त अपना परलोक सुधारने या इस लोक में कुछ पाने सबकुछ लुटा देना चाहता है उन्हीं प्रभु कृष्ण ने भी कभी गौवंश की अनन सेवा कर उस गौदौली में अठखेलियां तक की है। अगर यों कहे कि कृष्णकाल में दूध, दही, छाछ, मक्खन, मानव जीवन व अर्थ का मजबूत आधार था उन्हीं भगवान की कर्मस्थली भारतवर्ष के भूभाग पर उस गौवंश के साथ मानव जगत द्वारा कितना जघन्य अत्याचार, अपमान आखिर क्यों। एक समृद्ध विरासत के हम उत्तराधिकारी कैसे भूल गये कि प्रकृति से प्राप्त जल, जंगल, झरने, नदी, पोखर, तालाबों का जल और जंगलों की घास और खेतों में जलाई जाने वाली पराली ठूटों का आहार लें मानव जगत की न जाने कितने पीढियों की पियोसी दूध, दही, मक्खन, छांछ का आहार फोकट में उपलब्ध करा उन्हें स्वस्थ समृद्ध, खुशहाल बनाती रही तो वहीं दूसरी ओर गोबर से ईधन और उस ईधन से सेनेट्राइज भोजन एवं हर सात दिन में समूचे घरों, आंगनों का सेनेट्राईजेशन गौ-मूत्र से औषधी तथा मरणो उपरान्त पशु-पक्षियों का भोजन खाल से वस्त्र तो हड्डी से अन्य उत्पाद बनते थे। मानव जगत को बगैर कुछ लिये बहुत कुछ देने वाली अमृतदायिनी कब मानव जगत के लिये अनुपयोगी हो तिरस्कार का पात्र बन गई पता ही नहीं चला। जहां वन अधिनियम में गौवंश से जंगलों की घास तो वहीं सत्ता, मानव के अहम अहंकार और स्वार्थो में उससे उसकी चरनोई भूमि, तालाब तथा बोर टियूबेल समृद्ध संस्कृति ने पोखल, तालाब सुखा दिये। आखिर क्या बिगाडा था इस मानव सभ्यता का अमृतदायिनी, औषध दायिनी गौवंश ने जो उन्हें सडकों और जंगलों में या तो जिन्दा मरने या फिर कसाई खानों में बिचने लावारिश छोड दिया गया। जबकि अगर जानकारों की माने तो गाय के प्रथम दूध से विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तो वहीं उसके दूध, दही, मक्खन, छांछ की तासिर न तो मानव के आध्यात्म और न ही विज्ञान से छिपी है। वहीं गोबर के कंडों के ईधन और राख और गोबर की लिपाई और गौ-मूत्र के ओषधीय गुणों तथा जंगलों को पोषित करने वाले जैविक खाद को कौन सा आध्यात्म विज्ञान नहीं जानता। मगर मानव सभ्यता ने अपने क्षणिक स्वार्थ ने अपने अहम अहंकार धन पिपासुओं की लालसा ने सबकुछ तबाह कर दिया। परिणाम कि आज जब हमारी मानव सभ्यता अपनी सभ्यता को तिलांजली दें ग्लोबल दौर में है तो कोरोना जैसी महामारी तो सिर्फ शुरूआत भर कही जा सकती है। इससे आगे न जाने इस मानव सभ्यता को क्या-क्या और देखना पडेगा फिलहाल यह भविष्य के गर्भ में है। काश आज भी बहुत देर नहीं हुई है जितनी जल्दी मानव जगत, सत्ता, सरकार सत्य को समझ लें उतना बेहतर होगा क्योंकि जो वर्तमान में घट रहा है या पूर्व में घट गया वह यथार्थ है। कोई आध्यात्म, आस्था नहीं कहीं ऐसा न हो कि मानव संस्कृति में कोरोना जैसी महामारी के चलते अन्धा अन्धे से पूछने लगे कि भाई मुझे तुम्हारा चेहरा क्यों नहीं दिख रहा है।
जय स्वराज
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