हिरणों के खेत में हाँका, कटेगा कुछ दिनों का दाना-पानी
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
समाज में कफन लूट संस्कृति के चलते अब धीरे-धीरे आत्मसात होती भ्रष्ट संस्कृति अब कफन लूट प्रतियोगिता की ओर अग्रसर है। अन्तोगत्वा अनुशासन को लेकर हिरणों की जमात पर हाँका और दाना-पानी में कटौती। अब सुशासन की संस्कृति बनती जा रही है।
यूं तो अनादिकाल से हिरणों की प्रजाति सामान्य, जीवन, निर्वहन करने वाले सात्विक जीवों के रुप में जानी जाती है। जो अपनी विलक्षण प्रतिभा और स्वच्छता के बल संवेदनशील हो, अपने जीवन का निर्वहन कर मांस भक्षियों का प्रिय निवाले के रुप में जानी जाती है। जब भी कभी व्यवस्थागत अतिरिक्त उम्मीद उनसे जीव-जगत ने पाली है। तो यह जमात अनादिकाल से प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक गुणों के चलते सृजन में तो सफल रही। मगर अन्यथा की स्थिति में वह असफल ही रही।
आज जिस तरह से शिक्षा जगत का कचरा उनके नैसर्गिक गुणों में आई अक्षमता के चलते हुआ है और स्वार्थवत सत्ताओं और कत्र्तव्य विमुख विधा, विद्ववान, संतो की जमात के बीच इन नामों का अर्थ बदला है। उसने जीव-जगत ही नहीं समुची इंसानियत को झंझकोर कर रख दिया है। क्योंकि कभी समाज, संस्कार, संस्कृति और प्राकृतिक सिद्धान्तो की रक्षा के लिए विधा, विद्ववान और संतों को माना और जाना जाता था। जो कई मर्तवा कत्र्तव्य विमुख सत्ताओं को सृजन में आने वाली बाधाओं से अवगत कराने में सक्षम सफल रहे। तो कई मर्तवा उन्होंने अपने ज्ञान और पुरुषार्थ के बल पर स्वार्थवत सत्ताओं और सृजन केे दुश्मनों को सबक सिखाने अपने कत्र्तव्य एवं उत्तदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ किया है। यहीं हमारी महान संस्कृति और संस्कार तथा शिक्षा के श्रोत रहे है। मगर दुर्भाग्य कि सर्वाधिक अक्षम, असफलता अगर किसी क्षेत्र में देखने मिलती है। तो वह हमारे प्रारंभिक, पारिवारिक पाठशालाओं के विघटन और गुरु, शिष्य, विधा, विद्ववानों के बीच की परम्पराओं में हास के कारण है।
जरुरी आज यह नहीं कि किसका नाम, मान-सम्मान, पुरुस्कार के लिए पुकारा जाता है। जरुरी यह है कि अपने कत्र्तव्यों के प्रति सजग रह, कौन अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध कर पाता है। मगर सृजन की सार्थकता तभी सार्थक, सफल सिद्ध साबित होगी, जब हम प्रकृति में मौजूद ऊर्जा का प्रबंधन विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थित कर, उसे परिणाम मूलक बना। मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध कर पाये।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
समाज में कफन लूट संस्कृति के चलते अब धीरे-धीरे आत्मसात होती भ्रष्ट संस्कृति अब कफन लूट प्रतियोगिता की ओर अग्रसर है। अन्तोगत्वा अनुशासन को लेकर हिरणों की जमात पर हाँका और दाना-पानी में कटौती। अब सुशासन की संस्कृति बनती जा रही है। यूं तो अनादिकाल से हिरणों की प्रजाति सामान्य, जीवन, निर्वहन करने वाले सात्विक जीवों के रुप में जानी जाती है। जो अपनी विलक्षण प्रतिभा और स्वच्छता के बल संवेदनशील हो, अपने जीवन का निर्वहन कर मांस भक्षियों का प्रिय निवाले के रुप में जानी जाती है। जब भी कभी व्यवस्थागत अतिरिक्त उम्मीद उनसे जीव-जगत ने पाली है। तो यह जमात अनादिकाल से प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक गुणों के चलते सृजन में तो सफल रही। मगर अन्यथा की स्थिति में वह असफल ही रही।
आज जिस तरह से शिक्षा जगत का कचरा उनके नैसर्गिक गुणों में आई अक्षमता के चलते हुआ है और स्वार्थवत सत्ताओं और कत्र्तव्य विमुख विधा, विद्ववान, संतो की जमात के बीच इन नामों का अर्थ बदला है। उसने जीव-जगत ही नहीं समुची इंसानियत को झंझकोर कर रख दिया है। क्योंकि कभी समाज, संस्कार, संस्कृति और प्राकृतिक सिद्धान्तो की रक्षा के लिए विधा, विद्ववान और संतों को माना और जाना जाता था। जो कई मर्तवा कत्र्तव्य विमुख सत्ताओं को सृजन में आने वाली बाधाओं से अवगत कराने में सक्षम सफल रहे। तो कई मर्तवा उन्होंने अपने ज्ञान और पुरुषार्थ के बल पर स्वार्थवत सत्ताओं और सृजन केे दुश्मनों को सबक सिखाने अपने कत्र्तव्य एवं उत्तदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ किया है। यहीं हमारी महान संस्कृति और संस्कार तथा शिक्षा के श्रोत रहे है। मगर दुर्भाग्य कि सर्वाधिक अक्षम, असफलता अगर किसी क्षेत्र में देखने मिलती है। तो वह हमारे प्रारंभिक, पारिवारिक पाठशालाओं के विघटन और गुरु, शिष्य, विधा, विद्ववानों के बीच की परम्पराओं में हास के कारण है।
जरुरी आज यह नहीं कि किसका नाम, मान-सम्मान, पुरुस्कार के लिए पुकारा जाता है। जरुरी यह है कि अपने कत्र्तव्यों के प्रति सजग रह, कौन अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध कर पाता है। मगर सृजन की सार्थकता तभी सार्थक, सफल सिद्ध साबित होगी, जब हम प्रकृति में मौजूद ऊर्जा का प्रबंधन विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थित कर, उसे परिणाम मूलक बना। मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध कर पाये।
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