सत्य के आभाव में कलंकित होता, स्वार्णिम इतिहास न तो यह सनातन है, न ही महान संस्कृति और संस्कार सृजन छोड़, स्वीकार्यता की खातिर, पूर्वजों का अपमान, शर्मनाक
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस देश की नीव मे सनातन और जिसकी ईमारत को महान संस्कृति, संस्कारों से गढ़ा गया हो। जिसके जीवन मूल्य और प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप शरीर में दिल बनकर धड़कते हो, जहां माता-पिता की आशा-आंकाक्षा ही नहीं, उनकी भावनाओं को ईश्वर का आदेश मान, मर्यादित जीवन जीने का इतिहास हो तथा सत्य के लिए न्याय युद्ध के प्रमाणिक परिणाम का जीवन दर्शन हो। ऐसे महान भूभाग पर अपने पूर्वजों के शौर्य, वैभव और कीर्ति को स्वयं की स्वीकार्यता की खातिर स्वार्णिम इतिहास को कलंकित करना शर्मनाक ही नहीं, दर्दनाक भी है। कौन नहीं जानता हमारी आस्था के प्रतीक हमारे प्रभु भगवान राम ने अपने पिता की आज्ञा और सौतेली मां की आंकाक्षा और उनके वचनों के मान-सम्मान के लिए राजसी ऐश्वर्य छोड़ नंगे पैर साधारण नागरिक के रुप में 14 वर्ष वनों में कष्टप्राद विचरण कर अपने कत्र्तव्यों का निष्ठा पूर्ण निर्वहन किया। कौन नहीं जानता श्रवण कुमार को जिन्होंने अपने माता-पिता को चारों धाम की यात्रा कराने स्वयं कन्धो के सहारे पैदल यात्रा कर इस महान भू-भाग पर ऐसा इतिहास रचा जिसकी चर्चा आज भी गर्व से की जाती है।
कौन नहीं जानता धर्म-न्याय युद्ध में कौरवों का क्या अंजाम हुआ ऐसे अनेको अनेक उदाहरण का यह महान भू-भाग साक्षी रहा है। कौन नहीं जानता 1857 की क्रान्ति के महान सपूत व राष्ट्र भक्तों की लाल, बाल, पाल तिकड़ी को जिन्होंने अपने सीमित संसाधनों के बीच राष्ट्र भक्ति के किन सिद्धान्त मूल्यों के लिए कार्य किया। मंगल पाण्डे, तात्या, नानक, रानी लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर जैसे कई राष्ट्र भक्तों के साथ हजारों लोगों ने मातृ-भूमि के लिए युद्ध कर अपनी कुर्बानियां दी। वहीं सच्चे राष्ट्र भक्त बालगंगाधर जी के आग्रह पर कैसे साउथ अफ्रीका से महात्मा गांधी भारत लौटे, सरदार भगतसिंह, पण्डित, चन्द्रशेखर आजाद, विस्मिल, सुभाष चन्द्रबोस ने भी अपनी मात्र भूमि लिए अपने-अपने बहुमूल्य जीवन की कुर्बानियां दी। आजादी पश्वात अखण्ड समृद्ध भारत के लिए जहां पण्डित जवाहर लाल नेहरु, सरदार बल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लालबहादुर शास्त्री, इन्दिरा गांधी सहित राजीव गांधी ने अपने जीवन का योगदान दिया तो वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने समुचे जीवन का निस्वार्थ भाव से डॉ.राम मनोहर लोहिया से लेकर पण्डित दीन-दयाल उपाध्याय सहित जयप्रकाश नारायण, श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया, अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिंहराव ने भारतीय लोकतंत्र ने बड़ा योगदान दिया।
देश को इतिहास पढ़ते या गढ़ते वक्त यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरु को 200 वर्ष अंग्रेजों के ही नहीं बल्कि 600 वर्षो से लुटे-पिटे कई भागों में बटे भू-भाग के रुप में गरीब आभाव ग्रस्त संसाधन विहीन राष्ट्र मिला था। जिसमें धर्म के नाम अलग हुए नये राष्ट्र पाकिस्तान सहित कई भागों में बटे राजा, रजवाड़े, जागीदारों से संघर्ष किया। इतना ही नहीं जहां 40 करोड़ से अधिक गरीब आबादी व बंजर भूमि को औद्योगिक धंधे, सिंचाई व्यवस्था बनाने का भार था तो वहीं 1948 में पाकिस्तान का जम्मू काश्मीर में आक्रमण के साथ दो भागों पर मची मारकाट स देश के प्रधानमंत्रीे जवाहर लाल नेहरु को जूझना पड़ा। इससे पूर्व कि देश सम्हल पाता कि 1962 में पड़ोसी मुल्क चीन ने विश्वासघात कर, आक्रमण किया। जिसने पण्डित नेहरु को तोड़कर ही नहीं, रखा बल्कि ऐसा आघात दिया जिसके सदमे ने उन्हें मौत के मुहाने तक पहुंचा दिया। ऐसे में वह शख्स ने कितना बड़ा आघात अपमान झेला होगा जिसने समुचा जीवन धन, दौलत, शौहरत अपने महान राष्ट्रवासियों के लिए अंग्रेजों से लड़़ते वक्त गबाई। सन 1965 में फिर पाकिस्तानी आक्रमण हुआ और उस समय भी तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति व राष्ट्र भक्ति का परिचय दें, पाकिस्तान को करारा जबाव दिया। इस हमले और शास्त्री जी के शौक से देश उभर पाता कि सन 1971 में फिर पाकिस्तान ने फिर भारत पर आक्रमण करने का दुसाहस किया। जिसका माकूल जबाव तत्कालीन देश की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने दृढ़ता और शौर्य का परिचय दे, पाकिस्तान को ऐतिहासिक सबक सिखाते हुए हजारों पाकिस्तान सैनिक, अफसरों का समर्पण भारतीय सेना के सामने करने पर मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं, किसानों के हित में चकबंदी, बैंको का राष्ट्रीयकरण राजा, सामंतों का प्रीवीपर्स पर बन्दिस लगा, बढ़ती आबादी रोकने परिवार नियोजन तथा 1971 के युद्ध पश्चात बिगड़ी व्यवस्था व अविश्चास की उठती आवाजों सहित देश को सही दिशा देने इमरजेंसी जैसे अप्रिय निर्णय व खालिस्तान के खिलाफ प्रभावी परिणाम केे लिए कठोर निर्णय जिसके लिए उन्हें उन्हीें के घर में उन्हीं के सुरक्षा प्रहरियों के हाथों आग उगलती गोलियों का शिकार होना पड़ा। वहीं दक्षिणी समस्या सुलझाने व देश की एकता-अखण्डता अक्षुण रखने स्व. राजीव गांधी को लिट्टे का शिकार हो जान से हाथ धोना पड़ा।
जब पंजाब में आतंक चरम पर था तब नरसिंह राव, बैयन्त सिंह, के.पी. एस गिल की तिकड़ी ने पंजाब से आतंकवाद समाप्त कर पंजाब की स्थिति को शान्त किया। मगर आजकल जिस तरह से अपने पूर्वजों को अपनी प्रतिष्ठा चमकाने, अपनी स्वीकार्यता की खातिर उनके योगदान को भुला अपने युवा व आने वाली पीढ़ी के सामने उन्हें कमतर आंकने और राष्ट्र के प्रति उनकी कृतज्ञता को कलंकित करने का जो चलन चल निकला है, वह शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी।
बेहतर हो कि लोग राष्ट्र की संस्कृति, संस्कारों के प्रति कृतज्ञता रख, एक नया इतिहास गढ़ राष्ट्र सृजन में अपनी कृतज्ञता साबित करें, न कि अपने पूर्वजों के गौरव, वैभव और उनकी कृतज्ञता को कलंकित कर, ऐसा इतिहास रचे जो न तो कभी ऐतिहासिक होगा और न ही इस राष्ट्र में कभी स्वीकार्य।
जय स्वराज
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