वीभत्स विकास का, खौफनाक चेहरा, भय मुक्त भ्रष्टाचार


धर्मेन्द्र सिंह
द.एम.मिरर 
प्रभावी देखरेख, कड़ी कार्यवाहीं के अभाव में है भय, मुक्त, भ्रष्टाचार का ऐसा नंगा नाच कभी देखने सुनने मिलेगा। शायद ही किसी ने सपने में सोचा होगा। मगर जिस तरह से अघोषित रुप से संगठित भ्रष्टाचार, भय, मुक्त अंदाज में चल रहा है वह प्रमाणिक ही नहीं अब तो जग जाहिर हो चला है। मगर प्रभावी देख-रेख और कड़ी कार्रवाई के अभाव में जो वीभत्स चेहरा विकास के नाम नजर आता है। वह बड़ा ही खौफनाक नहीं, खतरनाक भी है। 
आज जिस अंदाज में सड़क, पुल, भवनों का निर्माण शासन द्वारा निर्धारित दरों से 20 फीसदी से लेकर 30 फीसदी कम दरों पर चल रहा है उसने आम बुद्धिजीवी ही नहीं, निर्माण क्षेत्र से जुड़े पुराने नाम चीन निर्माण ऐजेन्सियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। ये अलग बात है कि निर्माण की दरे निर्धारित करने वाले शासन व सरकारों को इससे कोई सरोकार न हो। 
मगर उनका क्या जिनके टेक्स के पैसे से उन्हीं के लिए ये सड़के, पुल, भवन तैयार हो रहे है। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो चंद भजकलदारम के सहारे हाथों हाथ हासिल टेस्ट रिपोर्ट के सहारे गुणवत्ता से समझौता कर व रेत के नाम खुलेयाम कोपरा और ईट के नाम डस्ट की गुणवत्ता विहीन ईटों को भवनों में व सड़कों में उपयोग होने वाली सॉयल की क्वालिटी कम्पेक्सन इत्यादि में इतने बड़ें पैमाने पर अनदेखी की जा रही है। कि निर्माण से पूर्व कई सड़क, पुल, भवन स्वयं ही अपनी गुणवत्ता का बखान करते दिख जाते है। 
आज जिस तरह से निर्धारित दरों से कम दरों पर निर्माण कार्य एवं मरम्मत कार्य करोड़ों रुपये स्वाहा कर सरअंजाम तक पहुंचाये जा रहे है। अगर उन पर संज्ञान लिया जाए तो अगर किसी भी निर्माण कार्य को निर्धारित दर से 30 प्रतिशत  कम दर पर करने का अनुबंध किया जाता है और उस पर जीएसटी सहित इनकम टेक्स, अन्य कर, अमानत राशि सहित, ऑफिस खर्च, केम्प खर्च तथा निर्माण ऐजेंसी का 10 प्रतिशज प्रोपेट जोड़ लिया जाए तो लगभग बगैर निर्माण कार्य करे ही निर्माण ऐजेंसी के 50 फीसदी से अधिक दर स्वत: ही हो जाती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जो कार्य 100 फीसदी निर्धारित राशि में होना है जो शासन द्वारा निर्धारित होती है। तो फिर निर्माण ऐजेंसी उस कार्य को 50 फीसदी राशि में कैसे कर सकती है। सोचनीय विषय है कि दर निर्धारित करने वाले शासन और कार्य की दरें स्वीकृत करने वाले अधिकारियों को। मगर यह सबकुछ शासन की नाक की नीचे खुलेयाम चल रहा है। ्रऐसे में यहांं समझने वाली बात यह है कि या तो दरे निर्धारित करने वाला शासन का विभाग उसके इन्जीनियरों का आकलन गलत है या फिर निर्माण की गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है जो खतरनाक है। फिलहाल यह विषय, शासन या सरकार का ही नहीं आम जागरुक नागरिक का भी होना चाहिए। अगर तरह देख-रेख में कोताही और निर्माण की गुणवत्ता में समझौता कर सुपरवीजन करने का उत्तरदायित्व सम्हालने वाले घर बैठें ही मूल्यांकन करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़े। क्योंकि निर्माण से जुड़े कार्यो पर न तो अब प्रभावी देख-रेख नजर आती न ही शासन स्तर से कोई कड़ी कार्रवाई, सिवाए छोटी-मोटी छापेमारी जो भी नागरिकों की शिकायत पर होती है। ऐसे में भय मुक्त भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगेगी यह यक्ष प्रश्न आज सभी के सामने है। 

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