वोट और नोट को लेकर, धन पिचासौ का नंगा नाच कत्र्तव्य विमुख दरबार में, मानवता के चीरहरण को, जबावदेही से आस


विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
व्ही.एस.भुल्ले
जिस तरह से जम्मू द्वीप, आर्य व्रत, भरत खण्डे के नाम से जाने वाले इस महान पवित्र भूभाग पर सारे तंत्र, वंश की स्थापना पश्चात लोकतंत्र में जननायक वोट और धन पिपासू नोट कबाडऩे कत्र्तव्य विमुख दरबार में मानवता का चीरहरण करने अभियान चलाए हुए है। ऐसे में एक आशा की किरण जबावदेही से जान पड़ती है। महाभारत में तो स्वयं प्रभु कृष्ण ने द्रोपति की लाज रख उनकी लाज बचा ली थी। मगर इस महान लोकतंत्र में आए दिन होते जनाकांक्षा-आशा, उम्मीद मानव के नैसर्गिक कत्र्तव्य अधिकारों के चीरहरण की रक्षा कैसे हो। जब रक्षक ही सत्ता और तंत्र में बैठ सेवा के नाम ऐश्वर्य तथा धन पिचास बन रहे हो। 
क्या इस महान भूभाग की महान विरासत के वंशज अपनी आने वाली पीढ़ी को यहीं विरासत छोड़ जाएंगे। जिसमें स्वच्छंद विचरण तो मौजूद वातावरण में सांस तक लेना मुश्किल हो रहा है। ऐसा नहीं कि सभी जननायक और लोकसेवक इस पिचासू प्रवृति के शिकार हो। कुछ ऐसे भी राष्ट्र भक्त, जननायक, लोकसेवक भी आज इस महान भूभाग पर मौजूद है। जो बगैर किसी आशा-आकांक्षा के लिए अपनी महान विरासत और महान भूभाग सहित उन अभाव ग्रस्त, पीढि़त, वंचित ज्ञान से दूर अपना नैसर्गिक जीवन जी रहे लोगों की सेवा में जीजान से जुटे है और किसी भी कुर्बानी के तैयार। 
इससे पूर्व भी कई जननायक, लोकसेवक, संत पुरुष, विद्यवान, आम नागरिक अपने पुरुषार्थ और कृतज्ञ से राष्ट्र जनसेवा कर अपना सबकुछ लुटा कुर्बानियां दें, अपनी सिद्धता साबित करते रहे है। 
मगर अफसोस कि सत्ता, सरकार, संगठन, लोकसेवक, समाजसेवी और एक अरब से अधिक नागरिकों के बीच कब नरपिचास, बलात्कारी, बहु-बेटी, बहिन-बच्चियों की इज्जत तार-तार कर देते है। करोड़ों से बनने वाली भवन, सड़क, पुल कब निर्दोश लोगों को मौत की नींद सुला देते है। इतना ही नहीं, बड़े-बड़े चिकित्सकों, चिकित्सालय के आभाव में, आभाव ग्रस्त लोग दम तोड़ देते है। जो नस्ल कभ विश्व का मार्गदर्शन करने उतावली बन अपनी सार्थकता, सृजन सिद्ध करने में सिद्धस्त थी। आज वह सिर्फ एक वेजान अनुशासनहीन जीवंत मशीन बनकर रह गई है। जो हाथ कभी स्वयं ही लोगों को रोजगार देने में सक्षम और भूखों को अन्नदान करने में भामास: अन्नदाता कहे जाते थे। वह आज आत्महत्या पर मजबूर है। इतनी बड़ी व्यवस्था और करोड़ों करोड़ प्रमाणिक जननायक, लोकसेवकों के रहते समस्यायें, अव्यवस्थाएं देत्यों की तरह पैर पसारे सामने पड़ी रहती है और सबकुछ खुली आंखों के सामने होने के बावजूद किसी की भी जबावदही सुनिश्चित नहीं होती। कारण सत्ता के लिए वोट की फसल काटने वाले वोट के लिए व्यस्त और धन पिसासू, धन कबाडऩे में मस्त बने रहते है। ऐसे में इस महान भूभाग और इसकी विरासत की रक्षा कौन करे, यह यक्ष प्रश्न देश के उन युवा और बुजुर्गो के सामने है। जिनके कंधों पर सामूहिक कल्याण की जबावदेही। आदि अनादिकाल से रही है। जिनके रगो में आज भी कत्र्तव्य निष्ठा जबावदेही खून बनकर दौड़ रही है। जरुरत आज इस बात की है कि जन, राष्ट्र्र, कल्याण के महायज्ञ की शुरुआत कौन करें। ऐसे जननायक और जनसेवक, लोकसेवकों का सारथी कौन बने जो आज भी अपना सबकुछ लुटा उन पीडि़त, वंचित, गांव, गरीब की सेवा में दिन रात लगे है और उनकी नैसर्गिक आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु सबकुछ लुटाने तैयार बैठे है। 
बेहतर हो कि हम स्वयं को पहचान सही रास्ते का निर्माण करें और स्वयं के कल्याण सहित समुचे जीव, जगत के कल्याण हेतु लोगों का मार्ग प्रस्त कर, ऐसे वातावरण का निर्माण करें, जिसमें वोट और नोट पिचासौ का कोई स्थान न हो। जरुरत पड़े तो ऐसे लोगों को वोट के शस्त्र के साथ ही ज्ञान के शास्त्र से भी पराजित कर अपने राष्ट्र और जन सहित जीव-जगत के कल्याण की शुरुआत करें। यहीं हमारा धर्म और यहीं हमारा कर्म होना चाहिए। 

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