72 वें स्वतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर चंदे की चर्चा लोकतंत्र,जनतंत्र में कर बाध्यता है चंदा नहीं सत्ता, सरकार प्रमुख सहित सहयोगी जोड़ेंगे चंदा


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब इसे 21वी सदी का सबसे बड़ा मजाक समझा जाए या दिवालियापन जो 14 वर्षो तक सत्ता सुख भोगने वाले दल मुख्यमंत्री सहित,  दल सेगाड़ी भरे भारी, प्रभारी चंदा इक_ा करेंगे। अब एऐ से मे अगर कोई कंगाल दिवालिया दल संस्था चंदा या जरूरतमंद भीख मांगे तो समझ में आता है मगर जिस दल की 14 वर्ष से सरकार है,जिसके मंत्री, मुख्यमंत्री, मातहत, जहाज हेलीकॉप्टरों सहित लाखों रुपए की वातानुकूलित ऐसी कारों मैं सफर कर शाही जीवन जीते हो जिस दल के पदाधिकारी सहयोगी संगठनों के जवाबदेह लोग चार पहिया वाहन का सफर करते हो सरकार के मातहतों कार्यालय आवासों पर कीमती वाहन खड़े रहते हो ऐसे मे चर्चाओं की माने तो इतना ही नहीं देश भर मे सर्वाधिक चंदा, सैकड़ों करोड़ बतौर और स्वयं को 10 करोडी सदस्यों वाला दल होने का दम भरता हो उसे चंदे की क्या जरूरत है। अगर मान भी लिया जाए कि पर सदस्य दस हजार भी इक_ा हो तो लगभग 10 हजार करोड़ तो वैसे ही इक_ा हो जाएंगे।
अब यह दल की जिद है या जुनून जो 230 विधानसभा क्षेत्रों से 25-25 लाख रुपए का चंदा जन सहयोग से इक_ा करने की  चर्चा मीडिया में सरगर्म है और वह भी ऐसे बैबस जनतंत्र मे 80 करोड़ से अधिक सस्ते राशन के मोहताज एवं 35 करोड़ के लगभग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हो। जिस लोकतंत्र में आधे से अधिक माता, बहिने, बच्चियां अल्प रक्त की शिकार हो, जहां के लोग गांव, गली में रह, नैसर्गिक सुविधाओं से अभावग्रस्त रह, औपचारिक, अनौपचारिक तौर पर टैक्स के रूप में धन चुकाते हो। ऐसे लोकतंत्र में 14 वर्ष से सत्ता सुख भोगते दल का चंदा अभियान चिंताजनक है। बहरहाल महान लोकतंत्र की बिलबिलाती जनता फिलहाल नैसर्गिक सुविधा शुद्ध, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार को लेकर तो संघर्षरत है ही। वहीं स्वार्थवत के रहते  सड़क, सामाजिक, सरोकारों जैसी  दैनिक समस्याओं  से भी दो चार होने पर  मजबूर है । मगर लोकतंत्र जनतंत्र  मैं जनता का  कर्म ही नहीं यह धर्म भी है अपने महान पूर्वजों के मान सम्मान, स्वाभिमान की  रक्षा की खातिर  फटेहाल रहने के बावजूद भी  आज  भामासा,हरिश्चंद्र स्थिति में है। अगर बेबस जनता और दान का विश्लेषण वह तो  इस लोकतंत्र में  राजा बलि की कहानी भी  ओछी पड़ जाएगी। यहां ध्यान देने योग्य  बात इस राज्य  और राष्ट्र के नागरिकों के लिए  खासकर  उन युवाओं के लिए  जो स्वयं के विकास को  सर्वांगीण विकास मान अपने भविष्य को अधिक  ंसंघर्षपूर्ण  बनाने में  लगे हैं  उन्हें  सोचना होगा  कि कम से कम आजादी के 71 वर्ष बाद  अब कोई ऐसा दल संस्था लोकतंत्र के नाम पर  वोट कबा? के। जो विगत कुछ दशकों से सेवा और कल्याण मैं असफल और अक्षम रहा है तथा जो उपलब्धि के नाम झूठे आंकड़े झूठे आश्वासन दें जन भावनाओं शोषण करते नहीं थकते। बेहतर हो कि गांव गली के  अभावग्रस्त  पीड़ित वंचित  लोग  स्वयं का राज हासिल करने  स्वराज के रास्ते  आने वाले चुनावों में  स्वयं की  अमूल्य वोट  और 10 के नोट  का योगदान  अपने बीच के ऐसे व्यक्ति को  जनप्रतिनिधि  चुनने में खर्च करें  जो उनके बीच का हो  किसी दल  यह संस्था से  ना जुड़े हो और अपने  बहुमूल्य  वोट  और नोट  के उसे  उस  संस्था में बैठाने का जी तोड़  संघर्ष करें। जहां से स्वराज प्राप्त कर  स्वयं के जीवन समाज और राष्ट्र को  समृद्ध, खुशहाल बनाया जा सके। ऐसे  कानून  और नीतियां बनाई जा सके, जो स्वार्थवत सताए  चुनावों में वोट  और चंदे में नोट  लेने के बावजूद  नहीं बना सकें । हमें  यह नहीं भूलना चाहिए  कि इन  71 वर्षों में हमारी कई पीढय़िां  चंदे में नोट और चुनावों में वोट  देते देते अभावग्रस्त जीवन जीते हुए  कभी अपनी पीढ़ी  का जीवन खुशहाल, समृद्ध नहीं बना सकी।
जय स्वराज

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता