संविधान, संवैधानिक संस्थाओं को सशक्त, सक्षम बनाने में संस्था, संगठनों की भूमिका अहम कृतज्ञता ही बना सकती है मजबूत लोकतंत्र


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
कहते है कि कभी तो जाने अनजाने में ऐसा कुछ गलत हुआ है जिसकी प्रतिक्रिया बस ऐसा कुछ गलत अब हमारे सामने है। जो किसी भी बुद्धिजीवी समझदार जागरुक व्यक्ति को विचलित कर देता है। 
अब यह राष्ट्र जन प्रेम से ओत-प्रोत शान्ति, अहिंसा का मार्ग हो या फिर वह  संघर्ष पूर्ण मार्ग जो हिंसा वेमन्यस्ता से होकर गुजरता है। 
ये अलग बात है कि दोनों का मुकाम और लक्ष्य एक थे। मगर रास्ते अनेक आज जिस तरह से संविधान की मंशा और संवैधानिक संस्थायें दबाव पूर्ण माहौल के बीच तथा आम जन, विचलित मानसिकता के साथ जीवन निर्वहन करने पर मजबूर है। ऐसे में सामाजिक, राष्ट्र भक्त, संस्था, संगठनों की भूमिका संविधान व संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत शसक्त बनाने में अहम हो जाती है। 
क्योंकि किसी भी व्यवस्था के लिए उसके संविधान से बड़ा और कोई विधान नहीं हो सकता व खासकर लोकतांत्रिक उस राष्ट्र के लिए तो बिल्कुल भी नहीं जहां के नागरिकों ने अपने विधान का मान-सम्मान रखते हुए अपने महान संविधान को अंगीकार किया हो। जिसकी मंशा व भावना की रक्षा की जबावदेही उन संवैधानिक संस्थाओं की थी। जिनका संचालन हमारे ही बीच योग्य लोग विधान परिषद या कार्य पालिका में बैठ करते रहे है और एक मजबूत लोकतंत्र की स्थापना में अपना अहम योगदान देते रहे है। तो फिर चूक कहा हुई कि आज यहीं हमारे आगे सबसे बड़ा यक्ष प्रश्र है। 
आज जिस तरह से हमारे लोकतंत्र में धर्म के नाम पर धर्माधिता वर्ग जाति और राजनीति के नाम संगठित गिरोह की भावना पनप रही है। वह हमारे महान राष्ट्र जन ही नहीं लोकतंत्र के लिए घातक है। उससे बड़ी घातक वह प्रवृति है जो संविधान, कानून से अलग सड़क पर स्वयं न्याय चाहती है और भीड़ की आड़ में स्वयं न्याय करना चाहती है। 
अगर निराकरण का विचार, सामाजिक संरचना अनुरुप है तो संघर्ष सुनिश्चित है। अगर निराकरण का मार्ग शान्ति, अहिंसा है तो निश्चित ही हमें संविधान उन्मुख अपने कत्र्तव्य, जबावदेहियों का निष्ठा पूर्ण निर्वहन करना होगा और यहीं किसी महान राष्ट्र और लोकतंत्र के हित में होगा। यहीं समझने वाली बात संवैधानिक संस्थाओं में बैठे लोगों के लिए और यहीं समझने योग्य बात उन संस्था, संगठनों को है जो स्वयं को संरक्षक की भूमिका में देखना चाहते है। क्योंकि संरक्षक का भाव सभी के साथ समान अनुशासित और सर्व कल्याणकारी होना ही उसकी सिद्धता है। 

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