सैलाब का सच बैतरजीह प्राकृतिक संपदा का दोहन, लूट, वनो से छेड़छाड़, अतिक्रमण विनाश की जड़


विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
भूकम्प, आंधी, तूफान, सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि का दंश झेलते हुये इस वर्ष या इससे पूर्व वर्षो में देश के कई प्रदेशों ने जो जल सैलाब का दंश झेला है वह किसी से छिपा नहीं। मगर इस मर्तवा जिस तरह से उत्तराखण्ड, हिमाचल, केरल, महाराष्ट्र ने जल सैलाब देखा और भोगा है। वह समुचे देश प्रदेश की संवैधानिक व्यवस्था ही नहीं, समुचे मानव जगत सहित आम नागरिक के लिए विचारणीय विषय है।       
कहते है जिस तरह से आम मानव के लिए सुगम रास्ते, पुल, पुलिया की आवश्यकता होती। उसी तरह से समुद्र से उठने वाले मानसून के लिए भी प्राकृतिक हाईवे जो समुद्र में मिलने वाली नदी, नाले, झरने, जंगल, वृक्ष, पहाड़ के माध्यम उपलब्ध होते है। मगर लालची, स्वार्थी मानव स्वभाव व लापरवाही की श्रोत हमारी संवैधानिक संस्थाओं के चलते इस तरह से मानसून के हाईवे, सड़कों के किनारे अतिक्रमण, बैतरजीह प्रकृति को दोहन प्राकृतिक संपदा की सुनियोजित लूट ने आज प्रकृति मानसून को विनाश के लिए मजबूर कर दिया। परिणाम मानसून पश्चिम बंगाल से उठे या दक्षिणी पश्चिमी भाग से पानी से भरे ताकतवर बादल या तो सीधे उत्तर के उत्तराखण्ड, हिमाचल, जम्बू काश्मीर में तबाही मचाते है या असम, बिहार, उ.प्र. में या फिर कमजोर बादल मुम्बई, चेन्नई या आन्ध्र के अन्य शहरों में तबाही मचाते है। मगर जो प्रकृति का कहर इस बारिश में केरल, उत्तराखण्ड, हिमाचल में टूटा है वह बड़ा ही डरावना है। जब तक हम नहीं सुधरेगें संवेदनशील नहीं बनेगें और हमारी सत्ता उन्मुख सोच, संवैधानिक संस्थाओं में बैठे लोग चुनावी मैलो से दूर हो नहीं सोचेगें तब तक इस देश को इस तरह की तबाही झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

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