कत्र्तव्य निर्वहन के बजाए, कुर्तक की पराकाष्ठा , सत्ता के लिए बड़े पैमाने पर जनधन बर्बाद , स्वार्थ और संसाधनों के आभाव में, पंगू हुआ पुरूषार्थ


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 

जिनके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत हमारे पूर्वजों ने कड़े संघर्ष, अनगिनत कुर्बानियों के पश्वात की थी जिसके चलते एक समृद्ध लोकतांत्रिक प्रणाली अस्तित्व में आई है। आज वह अपने मूल मार्ग, उद्देश्यों से भटक स्वार्थवत सत्ताओं की राज्य, जनकल्याण से इतर स्वार्थ सिद्धि का माध्यम साबित हो रही है। जिसमें घोषित अघोषित तौर पर सत्ता के लिए बड़े पैमाने पर लोक धन, जनधन, जो गाड़े पसीने की कमाई गरीबों से टेक्स के रुप में प्राप्त होती है, बर्बादी हो रही है। जो किसी भी स्वस्थ्य लोकतंत्र या राज व्यवस्था के लिए एक अक्षम्य अपराध ही कहा जायेगा। 
क्योंकि राजकोष वह धन होता है जो विभिन्न माध्ययमों से टेक्स के रुप में जनता से ही प्राप्त होता है। अगर राजकोष, राज्य, जनकल्याण, विकास के बजाये स्वार्थी सत्ताओं की स्वार्थ पूर्ति या सत्ता प्राप्ति के लिए घोषित अघोषित तौर पर लोक कल्याण, जनकल्याण के नाम बर्बाद होने लगे। समझो लोकतंत्र खतरे में है। किसी भी सत्ता, शासक, शासन का राजधर्म होता है कि वह सत्ता से संबंध औपचारिक, अनौपचारिक तौर से जुड़े उन लोगों से राजकोष, जनधन की रक्षा कर उसे राज्य के विकास, जनता विकास व जनकल्याण सहित उनकी सुरक्षा पर खर्च करें। 
मगर बड़े-बड़े प्रचार-प्रसार पर छवि चमकाने या जनाधार बढ़ाने वह जनधन, लोक धन, लोकलुभावन योजनाओं, कार्यक्रमों पर बर्बाद हो, तो यह राजधर्म नहीं हो सकता। जबकि स्थिति में कि जब राज्य में कोई आपदा, विपदा, प्राकृतिक या मानवीय भूल बस विपदा न आयी हो। केवल सत्ता के लिए राजकोष को लुटा देना राजधर्म  नहीं हो सकता। 
ऐसे में जनता को राजधर्म बनता है कि वह जिस भी सरकार को चुने और जो संवैधानिक संस्थायें जबावदेह हो उनसे यह सवाल अवश्य करें कि आखिर हम गरीब सस्ते राशन से मोहताज लोगों से प्राप्त टेक्स की राज्य, जन कल्याण छोड़ अन्य कार्यो में बर्बादी क्यों ? 
क्योंकि जब तक जनता नहीं जागेगी और स्वार्थवत सत्ता व गिरोह बंद दलों को चुनावों के माध्यम से उखाड़ कर, सत्ता से बाहर फैंक, स्वयं उस सत्ता तक नहीं पहुंचती तब तक अहम, अहंकारी सत्तामद में चूर सत्तायें, सरकारें इसी तरह स्वयं स्वार्थ पूर्ति व सत्ता प्राप्ति के लिए जनसेवा के नाम जनधन, लोकधन की बर्बादी कर, स्वयं स्वार्थ सिद्धि करती रहेंगीं। 
बेहतर हो कि जागरुक लोग गांव, गलियों से बाहर निकल, महान लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रास्ते ऐसी सत्ताओं की स्थापना में जनजागरण कर, गांव, गली में अपना योगदान दे जो, राज्य व जनकल्याणकारी होने के साथ राजकोष की रक्षा करने में सक्षम हो और राज्य के नागरिकों के जीवन को सुरक्षित, समृद्ध, खुशहाल बना सके तथा राज्य व जन को विरासत में मिली अपनी महान समृद्धि, संसाधन और संस्कृति की रक्षा कर, राज्य में एक नई राजनीति एवं सृजन का सूत्रपात कर सके। 
जय स्वराज 

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता