म.प्र. में सरकार और शासन का शर्मनाक प्रदर्शन आजादी के दिन जल प्रलय से जूझा जीवन कई घंटों के संघर्ष के बाद बची जान


दि.एम.मिरर समाचार सेवा। 
वीरेन्द्र शर्मा
म.प्र. शिवपुरी। शिवपुरी शहर ही नहीं, ग्वालियर में लोग जब 72वें स्वतंत्रता दिवस मनाने की खुमारी में डूबे थे। तभी एक दर्दनाक दुखत खबर शिवपुरी से 45 व ग्वालियर से लगभग 65 किलोमीटर दूर सुल्तानगढ़ जल प्रपात से खबर आई कि अचानक आए जल सैलाब में 12 लोग बह गए व लगभग 30 से अधिक लोग तेज जल सैलाब के बीच मौजूद चट्टान पर फसे हुए है। दोपहर 3 बजे आई खबर से दोनों ही शहरों में हड़कंप मच गया और प्रशासनिक तंत्र अपनी व्यवस्था जुटाने में। तमाम मशक्कत के बाद शाम 6 बजे तक सार्थक सहयोग की मुद्रा में नजर आए शासन और सरकार ने हेलिकॉप्टर की मदद से 5 लोगों को तो लिफ्ट करके बचा लिया। मगर शेष देर रात 10 बजे तक तमाम मदद और हेलिकॉप्टर की मदद के इंतजार में जान बचाने टापू नुमा चट्टान बैठ ईश्वर से प्रार्थना करते रहे। 
ये अलग बात है कि इस बीच देर शाम तक जहां शासन के आलाअधिकारी सहित केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर एवं म.प्र. सरकार की मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया घटना स्थल पर पहुंच चुकी थीं तथा शासन के आला अधिकारी भी मौके बारदात पर मौजूद थे। जब देर रात तक हेलिकॉप्टर नहीं लौटा और न ही ऐनडीआरफ की टीमें पहुंच सकी तब स्थानीय लोगों की मदद से रस्से के माध्यम से जल सैलाब कम होने पर लोगों की जाने बचाई जा सकी। 
अब ऐसे में यक्ष सवाल यह है कि जब देश के लाल किले की प्राचीर से देश के यशस्वी प्रधानमंत्री देश को अपनी सरकार की सैन्य, सामाजिक, आर्थिक एवं आकाशीय शक्तियों को गिना देश को सभी तरह की सुरक्षा, सेवा, न्याय का ढांढस बधा रहे थे। उसके कुछ ही घंटों बाद घटी इस लोंहमर्षक घटना के परिणाम और म.प्र. सरकार व शासन की कोशिशें इस बात का प्रमाण है कि इतने बड़े प्रदेश व सेवा कल्याण के नाम स्वयं को भामासाह की श्रेणी में रखने वाले प्रदेश के पास 21वीं की सदी के देश में जब डिजीटल स्पेश हवाई क्रान्ति का दौर चल रहा हो उसके पास एक अदना-सा हेलिकॉप्टर तक नहीं जो रात में लिफ्ट कर लोगों की जान बचा पाता, न ही बारिश से पूर्व हर वर्ष बाढ़, आपदा, प्रबंधन सेल के पास ऐसे संसाधन जो दो ढाई सौ फिट की दूरी से लोगों को सुरक्षित पानी के सैलाब से बचा सके। हर वर्ष हर जिले में बर्षात से पूर्व आपदा नियंत्रण कक्ष खोलने वाले इन आपदा केन्द्रों पर न तो ऐसे गोताखोर संसाधन नजर आए, न ही सरकार और शासन में ऐसे रणनीतकार जो तत्कालिक समस्या पर सटीक निर्णय लें, जिन्दगी से जूझते लोगों की जान बचा पाते। बजाये टी.व्ही. चैनलों पर अपने व्यान और अपडेट देने के। हद तब हो गई जब प्रदेेश के मुख्यमंत्री भोपाल व केंद्रीय मंत्री घटना स्थल और एक इंदौर के बड़े नेता व भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सहित कमिश्रर, कलेक्टर टी.व्हीयों पर घटनाक्रम के 6 घंटे बाद बचाने की कोशिश के सिर्फ व्यान देते नजर आए। मगर अफसोस जनक बात यह है कि जहां 30 जिन्दगियां मौत के सैलाब घिरी हों और सवा सौ करोड़ के देश जो विश्व की छठे नंबर की आर्थिक महाशक्ति बनने छटपटा रहा हो उसके पास रात में उड़ान भर लिफ्ट करने वाले हेलिकॉप्टर न हो। जबकि ग्वालियर, दिल्ली, आगरा से घटना स्थल की दूरी मात्र क्रमश: लगभग 65,250,450 किलोमीटर हो। अब इसे हम आजाद भारत का 71 वर्ष बाद भाग्य कहे या दुर्भाग्य कि खुदा न खास्ता अगर ऐसी कोई घटना फिर घटे तो आम नागरिक का क्या हाल होगा। जो अपनी सरकार और शासन के में बड़ी आस्था और विश्वास करते नहीं थकते। जिन्हें स्वयं के धन से पोषित कर, हर वो ताकत, सुविधा, संसाधन मुहैया कराते है। जिनका उपयोग आये दिन सरकार के लोग और शासन के लोग किया करते है। अगर म.प्र. सरकार चाहती तो वह अपने स्टेट प्लेन व हेलिकॉप्टर से या किराए के हेलिकॉप्टरों से दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक पानी में फसी जिन्दगियों को बचाने की कोशिश कर सकती थी। मगर दुर्भाग्य आजादी के दिन ऐसा नहीं हो सका और बैवस लोग कुछ बह गए तो कुछ अपनी जान बचाने में सफल रहे। ऐसा नहीं कि  इस तरह का हादसा सुल्तानगढ़ जल प्रपात पर पहली मर्तवा हुआ हो इससे पूर्व भी कई घटनाक्रम ऐसे हो चुके है। मगर तब और अब शासन-प्रशासन ने सिवायें नौकरी करने के दूसरा सबक नहीं लिया जो दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। 
जय स्वराज 


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