बौद्धिक भामाशाहों से कराहता प्रदेश, आंकड़ों के आगे दम तोड़ती अनुभूति कुर्तक की बजाए, कृतज्ञता की होती, तो न कराहता प्रदेश
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से सत्ता या सत्ता में बैठे लोग, दल लोगों की पीढ़ाओं से भरी खबरों व आरोप-प्रत्यारोपों की काट-छांट करने भ्रामक प्रचार-प्रसार, भाषण व आंकड़ों के माध्यम से पूर्ति करने की, अक्षम, असफल कोशिशें भाड़े या वैचारिक बौद्धिक कुर्तकियों के सहारे करने के बजाए, उन्होंने अपनी कृतज्ञता की होती और पूर्ण निष्टा ईमानदारी से अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन कर, अपनी जबावदेही उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया होता, तो आज जब चुनावी वयार चलने को है। ऐसे में उन्हें उन भाड़े के या वैचारिक बुद्धिजीवियों के कुर्तकों के रणकौशल का सहारा अपनी छवि चमकाने न लेना पड़ता।
ऐसी सत्ता और सत्ता मेंं बैठे लोगों को यह समझने होगा कि यह विरासत ऐसे तपस्वी लोगों की है। जिन्होंने पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त, गांव, गली, गरीब, किसानों के लिए अपना ऐश्वर्य अपने प्रियजनों को छोड़, पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन किया व समुचे जीवन सादगी पूर्ण जीवन जीते हुए कड़े संघर्षो का सामना कर स्वयं की राष्ट्र, समाज व दलों में सार्थकता सिद्ध की। मगर उन्होंने सृजन व सर्वकल्याण के मार्ग को कभी कलंकित नहीं होने दिया और राजनीति व समाज में वह एक बढ़कर एक नजीरे कायम करने में सिद्ध हुई है।
मगर आज जिस दुर्दशा के बीच आम गांव, गली के गरीब, किसान, पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त लोग और उनके बच्चे तथा प्रदेश की प्रतिभाऐं जो हजारों लाखों रुपया अपने मां-बाप के गाड़े पसीने की कमाई खर्च कर शिक्षा व कौशल प्राप्त कर चुके है या कर रहे है। आज वह सहज संसाधनों के अभाव में दरदर की ठोकरे खाने पर मजबूर होते है तथा प्रदेश की दिव्य-भव्य चमत्कारिक प्रतिभाऐं आज भी शिक्षा के नाम खुली दुकानों पर रट्टू तोता बन ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं का उपयोग करने में अक्षम, असफल और असर्मथ साबित हो रही है। देखा जाए तो कई नेताओं की तपो भूमि रहे, शान्ति के टापू के कहे जाने वाले इस प्रदेश में प्रकृति के अकूत भंडार भरे पड़े है व प्रतिभा, संसाधनों की भी इस प्रदेश में कोई कमी नहीं। जो सत्ता या सत्ता में बैठे लोगों तथा, तथाकथित मार्गदर्शकों के लिए दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक बात होना चाहिए।
कहते है कि गरीब पीडि़त, वंचित अभावग्रस्त गांव,गली का पेट और उनका घर, अगर बातों के बताशों और झूठे प्रचार-प्रसार तथा आंकड़ों से अनुभूति के आभाव में भर रहा होता तो लोग सड़कों पर अपना हक हासिल करने या नैसॢगक सुविधाऐं प्राप्त करने, अपनी बहुमूल्य जान की बाजी लगा कभी उस सत्ता के खिलाफ संघर्षरत न होते, जिसे वह अपना अमूल्य वोट देकर हर पांच वर्ष में चुनते आ रहे है।
सत्ताओं व सत्ता में बैठे लोगों के लिए समझने वाली बात यह भी है कि अगर उन्होंने अपने कत्र्तव्यों उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ कर, अगर आम नागरिकों की आशा आकांक्षा अनुरुप, अनुभूति के साथ इस प्रदेश को समृद्ध, खुशहाल बनाने की दिशा में कार्य किया होता तो आज इस प्रदेश के अधिसंख्यक लोग निर्धारित मानक से नीचे का अशुद्ध पेयजल ग्रहण कर गंभीर बीमारियों का शिकार नहीं हो रहे होते। अगर सत्ता व सत्तासीनों ने झूठे प्रसार-प्रचार के माध्यम व कुतर्क से परिपूर्ण बुद्धिजीवियों की मंडली को संरक्षण दें, उन्हें सक्षम बनाने के बजाए अगर अल्प रक्त की बीमारी से पीडि़त माता-बहिनों, बच्चों को पोषित करने पर्याप्त धन व स्वास्थ्य सेवाऐं उपलब्ध कराई होती, तो कुपोषण से मरने वालों का कलंक और कुपोषण जैसी महामारी से हमारे नौनिहालों की घसीटती जिन्दगी को यूं आभावों में न जीना पड़ता।
अघोषित केन्द्रीयकृत रोजगार, व्यापार, ठेकेदारी जैसे संसाधनों को भ्रष्टाचार से मुक्ति के नाम अगर संरक्षण न दिया होता और प्रदेश के सामने सत्य रख प्रतिभाओं को खुले दिल और दिमाग से संरक्षण दिया होता तो आज प्रदेश में समृद्धि खुशहाली, रोजगार के आयाम कुछ और ही होते। प्रदेश में प्रायाोजित संसाधनों का आभाव ही वह कलंक है जिससे सत्ता या सत्ता में बैठे लोगों को मुक्त होना अब असंभव ही नहीं, उनकी सबसे बड़ी अक्षमता, असफलता का प्रमाण है फिर दलील जो भी हो। मगर प्रदेश तो कलंकित हुआ ही है। इस सत्य को अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता। जिस प्रदेश का न तो कभी वर्तमान खराब रहा और न ही भविष्य कभी खराब रहने वाला है। उस प्रदेश में सबकुछ होने के बाद ऐसे हालात अवश्य सवाल खड़े करते है।
बेहतर हो कि भाई भतीजा बाद, वैचारिक अवशाद से निकल प्रदेश के बारे में सच्चे दिल से सोचा जाए तो इस प्रदेश को सोने की चिडिय़ा बनने से कोई नहीं रोक सकता। ऐसे में जरुरत है कि प्रदेश के बुद्धिजीवी, जागरुक नागरिक और सत्ता में बैठे या विपक्ष की भूमिका निभाने वाले लोग प्रदेश की समृद्धि, खुशहाली के मार्ग को प्रस्त करने की दिशा में बढ़े। जो कोई असंभव कार्य नहीं। जो हमारा इतिहास भी है और विरासत भी। क्योंकि हमारे प्रदेश में न तो ्रप्रतिभा न ही संसाधन और न ही पुरुषार्थ की कोई कमी है। सबकुछ संभव है। सवाल निष्ठापूर्ण ढंग से न्यायप्रिय, कत्र्तव्य निर्वहन और प्रबंधन का है। अगर हम कर पाए तो यहीं हमारे महान प्रदेश व पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त, गांव, गली, गरीब, किसान की सबसे बड़ी सेवा और हमारी राजनीति, समाज व परिवार के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
जय स्वराज

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