सुझाव नहीं, हिसाब और सवाल का वक्त 15 वर्षो में शिक्षा, स्वास्थ्य, समृद्धि, रोजगार का क्या हुआ दहलीज से पूर्व ही सुशासन ने क्यों दम तोड़ा


विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते हैं 15 वर्ष में बच्चे, बच्ची जवानी की दहलीज पर होते हैं ऊर्जा की उपलब्धता इतनी कि असंभव को भी संभव कर डालें, जो पैदा हुए वह जवानी की दहलीज पर है, जो जवानी की दहलीज पर थे, वह अब युवा हैं और जो युवा थे वह अब ऑव्हरऐज हो चुके है और जो ऑव्हरऐज थे, वह बुजुर्ग हो चुके है। वह भी न मुराद इस उम्मीद मे कि उन्हें आज नहीं तो कल वह गुणवत्ता पूर्ण, सृजनपूर्ण शिक्षा नसीब होगी, जो शिक्षित या किसी भी विधा में सामर्थवान थे। उन्हें सहज रोजगार ही नहीं, उन्हें उनकी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मिलेगा, जो बेकार थे, उन्हें संसाधन और काम करने का मौका मिलेगा, जो बुजुर्ग थे, उन्हें यह उम्मीद थी कि अब उनका बुढ़ापा चैन से कटेगा। हर नागरिक को सहज स्वास्थ सेवा, सुरक्षित वातावरण, तो बीमार दुखियों को अच्छा इलाज मिलेगा। जो अपने सामर्थ पर भरोसा करते है उन्हें अपनी मेहनत के बल पर समृद्ध बनने का मौका मिलेगा। मगर पहाड़ से 15 वर्ष बीत जाने के बाद भी आखिर लोगों को क्या नसीब हुआ यह आज समझने व विचार करने योग्य बात है। 
आज जब पुन: हम एक बार 5 वर्ष के लिए सरकार व जनसवेक चुनने की मुहाने पर है। तब हमें विगत 15 वर्ष का हिसाब-किताब ही नहीं, सवाल भी पूछना चाहिए कि स्वयं और शिक्षा के नाम, लाखो हजारों रुपए की जनधन से पगार, सुख, सुविधाऐं रेवडिय़ों की तरह बांटने के बावजूद भी अस्पतालों में चिकित्सक पर्याप्त स्टाफ क्यों नहीं। क्यों शिक्षित युवा, सृजन और छोटे व्यवसाई बेकार है। जिन 15 वर्षो में नौकरियों एवं अवसरों का सैलाब निकलना था वह कहां रुक गया। आखिर क्यों प्रदेश का सैंकड़ों नहीं, हजारों किसान वेभाव फांसी पर झूल गया। सवाल तो यह भी बनता है कि आखिर नेताओं और नौकरशाहों के ऐसे कौन से व्यापार, धंधे है, जो वह रातों-रात करोड़पति, अरबपति बन जाते है। क्यों गरीब के दरवाजे पहुंचने से पहले सेवा व सुशासन दम तोड़ जाता है।
प्रदेश में समृद्धि का ऐसा आलम कि गांव, गली, गरीब, मजदूर, किसान के घर बेकारी अब विलाप करती मिल जात है, यह वो सवाल है जिनका उत्तर किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में आवश्यक है। ऐसे में सुझाव नहीं, सवाल होने चाहिए और विगत 15 वर्षो के शासन में खर्च पाई-पाई का हिसाब होना चाहिए। जो कर्ज सेवा कल्याण विकास के नाम लगभग डेढ़ लाख करोड़ से अधिक का लिया गया उसका भी हिसाब-किताब सहित लिए गए कर्ज पर श्वेत पत्र जारी होना चाहिए यहीं मजबूत लोकतंत्र के लिए चुनावों में यक्ष सवाल होना चाहिए। तभी हम एक सशक्त, स्वस्थ, सर्वकल्याणकारी लोकतंत्र की कल्पना कर अपने कत्र्तव्यों का निष्ठापूर्ण निर्वहन कर सकते है। 
जय स्वराज

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