वोट की खातिर, अराजकता, अपराध, अपराधियों की अनदेखी, राजद्रोह उपेक्षा की उपज विद्रोह, प्राकृतिक स्वतंत्रता पर आघात, विध्वंस को बुलावा
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार।
सत्य को समझ अनुसार मानव, समाज, विद्यवान स्वच्छंदता, स्वार्थ, निस्वार्थ के रहते हम जो भी नाम क्यों न दे। और सत्ताये,ं समय, काल, परिस्थिति अनुसार जो भी व्यवस्था दे। मगर कहते है कि उपेक्षा की उपज विद्रोह और प्राकृतिक, स्वतंत्रता पर आघात विधवंस को बुलावा होता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वार्थ या वोट की खातिर अराजकता, अपराध, अपराधियों की अनदेखी स्वस्थ व्यवस्था के विनाश का कारण बनती हैं। जिस तरह से हमारे सियासी दल सत्ता की खातिर न्यायालय तथा निर्वाचन आयोग, स्वस्थ्य, स्वच्छ, लोकतंत्र की खातिर राजनीति को अराजक, अपराध, अपराधियों से बचाने की मंशा जाहिर कर चुके है। उसके बावजूद भी राजनीति में आंदोलनों के अपराध की आड़ में पनपते, अराजक, अपराध, अपराधी अब सभ्य समाज ही नहीं सियासत मे विद्रोह, विधवंस के कारण बन रहे हैं। फिर ऐसे लोग सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्रों मे मौजूद हो या फिर जाति, धर्म मे, जब तक हमारी लोकतांत्रिक सियासत इन अराजक, अपराध, अपराधियों से निजात नहीं पा लेती तब तक स्वच्छ, स्वस्थ, मजबूत लोकतंत्र और खुशहाल जीवन की कल्पना अधूरी ही रहने वाली हैं और वह महान संघर्ष भी बेकार जाने वाला है। जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी कड़ी तपस्या, संघर्ष, कुबानी कर हमें विरासत मे यह महान लोकतंत्र सौंपा हैं। सच तो यह हैं कि पूर्ववत व्यवस्थायें, प्राकृतिक सिद्धांत आधारित थी। जो जीवंत ही नहीं, स्वीकार्य भी थी। मगर महान बनने के जुनून ने एक ऐसी व्यवस्था हमारे बीच बना डाली जो न तो सहर्ष स्वीकार्य है न ही प्राकृतिक सिद्धांतों के अनुरूप है। बल्कि हमारे गैर जरूरी हस्तक्षेप ने हमारी व्यवस्था को एक ऐसे मुकाम लाकर छोड़ दिया है जहां से लौटना ही हम और हमारी व्यवस्था व मानव, जीव, जगत के हित में हैं। अगर हमनें आज भी सत्य की समझ दुरूस्त कर सुधार शुरू नहीं किए तो भविष्य कितना वीभत्स हो सकता हैं। इसकी कल्पना मात्र से मानवता का कापना स्वभाविक हैं।
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