संगठित गिरोहो की जकड़ में लोकतंत्र
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
न तो आमजन ही समृद्ध, खुशहाल हो सका, न ही आम गरीब,कार्यकर्ता का भला हो सका। संगठित गिरोंहो में तब्दील सत्ता, संगठनों का आलम यह है कि सेवा, विकास, कल्याण के नाम चन्द मुठ्ठी भर लोगों का तो कल्याण विकास हुआ। मगर गांव, गली, गरीब, किसान का कुछ नहीं हो सका। अब जबकि चुनाव एक मर्तवा फिर से सर पर है तो कोई बिलबिलाती जनता को भगवान, तो कोई कार्यकर्ता को मालिक बताने से भी गुरेज नहीं कर रहा है। अब यहां यक्ष सवाल यह है कि ऐसे में कैसे चलेगा लोकतंत्र और कैसे समृद्ध, खुशहाल होगा प्रदेश और कैसे होगा कल्याण। मगर ऐसे में समझने वाली बात यह है कि वोट देने से पहले आम गांव, गली, नगर प्रदेश में सक्षम, समृद्ध हुए उन सेवकों पर आम मतदाता नजर दौड़ाए और पता लगाए कि आखिर इतने कम समय में उनकी इतनी समृद्धि का राज क्या है। वह कौन से मार्ग है जहां से समृद्धि हासिल हुई। गर इतना पता कर पाये तो निश्चित ही हम अच्छे-सच्चे जनप्रति चुन, साफ-सुथरी सेवा भावी सरकार व समृद्धि शक्तिशाली लोकतंत्र स्थापित कर पायेगें और हर गांव, गली, नगर, शहर के बैवस, मायूस, आभावग्रस्त लोग भी अपना जीवन समृद्ध, खुशहाल बना पायेगें।
जय स्वराज
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