राहुल को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है पक्ष-विपक्ष को


वीरेन्द्र शर्मा 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तेवर के साथ आजकल राहुल सियासी समर में दिख रहे है उसे लेकर राजनैतिक पंडित ही नहीं, स्वयं उनके दल कॉग्रेस और उनके धुर विरोधी दल भाजपा के अपने कयास और विचार हो सकते है। मगर जो उनका व्यवहार और बॉडी लेंग्यूज आजकल दिख रहा है वह कुछ और ही इशारा करता है। अगर राजनीति, समाज और दर्शन को समझने वालो के बीच चल रही चर्चाओं की माने तो जहां उनकी गंभीरता वर्तमान माहौल के मद्देनजर स्पष्ट है तो वहीं वह चर्चाओं का कोई भी ऐसा मंच नहीं, छोडऩा चाहते। जो उनकी आजकल कार्यप्रणाली में शुमार है। 
जिस तरह से वह तेलांगना से लेकर राजस्थान, छत्तीसगढ़, म.प्र. के दौरे रोड़ शो और मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा पहुंच सर्वधर्म भाव के प्रदर्शन के साथ दिल्ली की सड़कों पर आम कार्यकर्ता की तरह संघर्ष करते दिख रहे है। इससे लगता है उनके मंसूबे साफ है। भले ही लोग कोई आरोप-प्रत्यारोप उनकी कार्यप्रणाली को लेकर करें। मगर इस बीच उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद जो असफलता का भाव प्रदर्शित होता है। उसके पीछे की चर्चा सिर्फ इतनी है कि इतनी सभा, रोड़ शो, रात्रि विश्राम के बावजूद उनकी सुरक्षा के नाम जो घेराबंदी रहती है और जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद आम विद्ववान समर्पित कार्यकर्ता, नेता, वक्ता उनसे मिलने या वह स्वयं विभिन्न मठाधीसों के रहते मिलने से चूक रहे है वह न तो कॉग्रेस के लिए शुभसंकेत है, न ही राहुल गांधी के लिए। अगर सुरक्षा अहम विषय है तो पूरी जांच उपरांत लोगों से मिलना चाहिए और लोगों को सुनना चाहिए। जिसकी आशा-आकांक्षा आम नागरिक से लेकर आम कार्यकर्ता, नेता, विधा, विद्ववान या उन पत्रकारों को रहती है जिनका चिंतन राष्ट्र व मानव को समर्पित होता है और जो लोग महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चल राष्ट्र को सशक्त, समृद्ध, खुशहाल बनाना या देखना चाहते है। बेहतर हो कि राहुल चालाक, चापलूस और चाटूकार जमात से दूर मान-सम्मान, स्वाभिमान और समाधान में विश्वास रखने वालो से संपर्क व संवाद स्थािपत कर ऐसे लोगों की एक नई टीम तैयार करें। जिनकी त्याग-तपस्या, राष्ट्र व मानव कल्याण के लिए समर्पित हो, और जो कॉग्रेस को ठीक से समझ राष्ट्र व मानव कल्याण के लिए बेहतर से बेहतर करने का मादा रखते है। मगर यह तभी संभव है जब राहुल अपनी सुरक्षा का ख्याल रख संवाद, संपर्क व चर्चा की शुरुआत अपने दौरों या फिर दिल्ली में रहने के दौरान करें तथा अपने कार्यालय को इतना व्यवहारिक और शालीन बनाए जहां मान-सम्मान, स्वाभिमान को स्थान मिल सके। क्योंकि राहुल उस परिवार के मुखिया है। जिन्होंने बगैर नफा-नुकसान ही नहीं, अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने राष्ट्र व मानव कल्याण के लिए कुर्बानी दी है, यहीं कॉग्रेस है। 

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