सत्ता का लाभ और वोट का मोह त्यागने से बनेगा शसक्त, समृद्ध, खुशहाल भारत: व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक स्वराज कौन दे कुर्बानी..........?


धर्मेन्द्र सिंह गुर्जर
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सत्ता लोभ वोट मोह मे डूबी राजनीति इस महान राष्ट्र और जन सहित देश में मौजूद विभिन्न धर्म, पंथ, जातियों का कितना भला कर पायेगी। जिसकी डिस्कनरी से त्याग, तपस्या, कुर्बानी जैसे शब्द सत्ता लोभ और वोट मोह मे बाहर हो चुके है और सेवा कल्याण के मायने सिर्फ वोट और सत्ता प्राप्ति बची है। जिसके चलते वोट धुव्रीकरण के घातक रास्ते भारतीय राजनीति मे भोले भाले भावूक लोगों के बीच सक्षम, सफल साबित हो रहे हैं। यह अलग बात है कि ऐसे में लोकतंत्र में मौजूद तथाकथित कुछ बौद्धिक चोर चापलूस, चालाक लोगों के लिये धु्रवीकरण का रास्ता इस महान लोकतंत्र मे ब्रम्हास्त्र जैसे कारगार हथियार साबित हो रहा हैं। 
विगत 30 वर्षो मे जिस धुव्रीकरण के  ब्रम्हास्त्र से लोगों को सत्ता समर्थन, वोट हासिल हुए उसने देश की राजनीति का ही चेहरा पलट दिया और जो लोग स्वच्छ, समृद्ध सेवा कल्याण की राजनीति करना चाहते थे। उन्हें जाने अंजाने, मजबूरी बस भोले वाले भावुक लोगों की आशा आकांक्षाओं का इस्तेमाल कर हासिये पर ढकेल दिया गया। जो किसी भी महान लोकतंत्र के लिए दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक भी होना चाहिए। वोट मोही सत्ता लोभियो ने लोकतंत्र को आज ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहां आम आदमी चुनाव तो दूर, सत्ता में सहभागिता के सपने भी नहीं सजो सकता। चुनावों में पानी की तरह पैसा सत्ता धन बाहुबल के गठजोड़  ने आज अघोषित तौर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वच्छंद राजनीति का सरेआम कत्ल किया है जिसकी चर्चा बेमानी लगती है सत्ता लोभी और वोट मोहियो की अगर सोशल इंजीनियङ्क्षरंग का घातक सूत्र देखें तो लोग आज सत्ता और वोट के लिए अब तो धर्म ही नहीं जाति से जाति और अब क्षेत्र से क्षेत्र को लोगों को लड़ाने से भी नहीं चूक रहे। पहले असम फिर महाराष्ट्र और अब गुजरात की घटनाएं साक्षी है अजाक्स सपाक्स जैसे आंदोलन भी सत्ता वोट मोह , लोभ के गर्भ से निकली वो संतानें हैं जिससे समृद्धि शक्ति शांति सौहार्द का प्रभावित होना स्वभाविक है। अब ऐसे मे एक ही सवाल उन भोले भाले, भावुक बैबस मजबूर लोगों के सामने है कि जो सत्ता वोट को मन माफिक ढंग से हासिल करने मे माहिर हो और सक्षम समृद्ध बन चुके है। जिनके पास सत्ता, धन व गिरोहबंद संख्या बल की ताकत है। फिर आधार उनका वैचारिक हो या सत्ता उन्मुख हो ऐसे लोगों से लोकतंत्र, शान्ति, सौहार्द की रक्षा कर, कैसे आमजन को समृद्ध, खुशहाल बना उनकी भी सत्ता मे सहभागिता सुनिश्चित कर इस राष्ट्र जन व लोकतंत्र को मजबूत, खुशहाल बनाया जाए। जिसके लिए समझने वालो को समझना होगा कि आसपास के लोगों को धर्म, जाति, दल को भूल यह समझना होगा। कि लोकतंत्र मे सरकारें किसी दल समर्थन या विरोध से नहीं बनती बल्कि जनता द्वारा चुने हुए विधायक, सांसद के वोट से बनती है। फिर वह निर्दलीय हो या किसी दल से। कयोंकि विधानसभा व लोकसभा मे भी सरकार बनाने गोपनीय तरीकें से मतदान होता हैं।
दूसरा अपना अमूल्य वोट किसी ऐसे प्रत्याशी को न दे, जिसकी छवि, चाल, चरित्र, आचार, व्यवहार ठीक न हो और ऐसे दल का सदस्य हो जो धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम वोट मांगता हो। जिसका परिवार, समाज, राष्ट्र कल्याण सेवा के क्षेत्र मे कोई योगदान न हो। जो अपने दल, धन या संख्या, बल, जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर वोट चाहता हो।
अगर हम गांव, गली, कस्बा, नगर, प्रदेश, देश के लोग अपने महान देश, गांव, गली, कस्बा, नगर, प्रदेश स्वयं और अपने परिवार के लिये चुनाव के दौरान एक माह के समय मे कड़ी मेहनत कर पाए तो निश्चित ही अगले पांच वर्ष हमें. सुखदायी और समृद्ध, खुशहाल होगें। बरना झूठ भावनाओं की लूट के लिए तथाकथित धनकुबेर वोट हासिल करने निकल चुके है। जो अकेले भी हो सकते है और तथाकथित दलों के नाम गिरोहबंद लोग भी।
जय स्वराज

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