प्रभावी रणनीत का अभाव सत्ता में बड़ी बाधा करो या मरो के साथ स्वयं सम्हालनी होगी म.प्र. की कमान


वीरेन्द्र शर्मा 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जनाकांक्षा, जनभावना को सहजने जब तक रणनीत प्रभावी नहीं होगी तब तक म.प्र. में सत्ता कॉग्रेस से दूर ही बनी रहेगी। भीड़ जुटना, जुटाना अलग बात है। मगर वोट में तब्दील होना अलग बात है, इसमें न तो कॉग्रेस आलाकमान का दोष है, न ही उनके उन रणनीतकारों का, जिनका सीधा संपर्क कभी जमीन से रहा ही नहीं, सो न तो ऐसे रणनीतकारों से जनभावना, जनाकांक्षा पूर्ति से जुड़े मुद्दों की उम्मीद करना चाहिए, न ही बूथ स्तर तो दूर नगर, कस्बों से गायब कर्मठ कार्यकर्ताओं के शून्यपन से क्योंकि संगठन का प्रबन्ध तो मठाधीसों के चलते बैसे भी म.प्र. में 15 वर्ष से धरासायी है। छोड़ बड़े चैनल और अखबारों को, ऐसे में एक ही रणनीत कारगार हो सकती है और वह है महात्मा गांधी की तरह करो या मरों आंदोलन की तरह। क्योंकि अगर कॉग्रेस 2018 चूकि तो उसके लिए कहीें यह निर्णायक सियासी युद्ध साबित न हो। जिसकी कि पूरी संभावना है। मगर कॉग्रेस के लिए जनता की नब्ज समझना जरुरी है। जिसका ज्ञान न तो उन रणनीतकारों को है, न ही उन प्रबंधकों को जो 15 वर्ष में जमीदोष हुई। कॉग्रेस को बचाने में अक्षम, असफल साबित होते रहे है। आज जब वक्त ने पल्टि मारी है। ऐसे में बैवजह के मुद्दे छोड़, ज्वलंत मुद्दों पर सवाल होने चाहिए जिनसे आम गांव, गली, गरीब, किसान ही नहीं, मजदूर, व्यापारी, व्यवसायी, नौकरशाही में त्राही-त्राही मची है। साथ ही समाधान भी ऐसे प्रभावी हो। जो लोगों को 15 वर्ष की पीढ़ा घुटन से निजात दिला सके। तब तो चल जायेगी। नहीं तो हाथों में आती सत्ता और कॉग्र्रेस के अस्तित्व के लिए 2018 भारी पढ़ जायें। तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।

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