जाति, धन, बल की ध्वजा, पताकाओं के बीच सिसकता लोकतंत्र जीत के मुगालतों के बीच अप्रत्याशित परिणामों की संभावना


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
असंकित, उपेक्षित, आक्रोश के बीच लहराती जाति, धन, बल की ध्वजा, पताकाओं के बीच भले ही आज लोकतंत्र सिसकने पर मजबूर हो और अहम अहंकार का डंका सरेयाम बज रहा हो। मगर अप्रत्याशित परिणामों की आशंका यह समझने काफी है कि जीत का मुगालता पालने वालों के मुगालते 11 दिसम्बर को धरासायी नजर आए, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 
क्योंकि सूचना क्रान्ति के दौर में जिस तेजी के साथ आम जन के बीच जागृति बढ़ी है उसने सत्ता भोगी लोगों की सारी पोल खोलकर रख दी है। देखा जाए तो झूठे, चरित्र, ऐश्वर्य का डंका ठोकने वालो को अब जनता बखूबी समझने लगी है। इसलिए आम जन के बीच जिस तरह से सत्ता उन्नमुख तथाकथित गिरोहबंद ,मंडलियों, दल, संगठन, संगठनों को वह पहचान टीका-टिप्पणी कर रही है वह बड़ी ही चैकाने वाली है। 
ऐसे में इतना तो तय है कि आम मतदाता का रूक किसके पक्ष में रहता है। यह तो 11 दिसम्बर को ही पता लगेगा। मगर जिस तरह का जनआक्रोश चर्चाओं के बीच है वह उन प्रत्याशियों के पक्ष में कतई नहीं। जो सेवा भाव को दरकिनार कर, स्वयं सेवा का मंसूबा पाले बैठे है। 
जय स्वराज

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