राष्ट्र-मानवतावादी, सामाजिक, सांस्कृतिक, सेवा भावी संगठनों का संरक्षण, सत्ता, सरकार ,परिषदों का राजधर्म
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यूं तो व्यक्ति से व्यक्ति, परिवार से परिवार और समाज से समाज मिलकर राष्ट्र का निर्माण होता है। जिनका अस्तित्व राष्ट्र, मानवतावादी, सांस्कृतिक सामाजिक सेवाभावी संगठनों पर निर्भर होता है। जिनकी समृद्धि, कल्याण, सुरक्षा के लिए सत्तायें, सरकारें और परिषदें अस्तित्व में आती है। अब फिर व्यवस्थायें लोकतांत्रिक हो या फिर राजतांत्रिक। मगर जब सत्तायें, सरकारें, परिषदें अपने कत्र्तव्य निर्वहन व जबावदेही निभाने में अक्षम, असफल साबित होने लगे तो इसे दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जायेगा।
बेहतर हो कि जब सत्ताये, सरकारें, परिषदें, अक्षम-असफल साबित हो ऐसे में नागरिकों की जबावदेही बढ़ जाती है। जिनके अस्तित्व पर राष्ट्रव समाज का अस्तित्व टिका होता है। बेहतर हो कि जहां नागरिक अपने कत्र्तव्य-जबावदेहियों का निर्वहन करें, तो वहीं सत्ता, सरकारें, परिषदें भी अपने राजधर्म को निभायें, तभी हम समृद्ध, खुशहाल, व्यवस्था बना तथा अपना व अपनी पीढ़ी का जीवन समृद्ध, खुशहाल बना पायेेगें और यह तभी संभव है कि जब हम लोकतंत्र के सबसे बड़े महाकुंभ निर्वाचन के दौरान अपना मताधिकार का उपयोग कर ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुने, जो हमें एक सशक्त, सेवाभावी, विकास उन्नमुख, कल्याणकारी सरकारें दे सकें।

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