आत्म बल खो , लोकतंत्र का धुआं उड़ाते दल* *सत्ता,स्वार्थ के लिए जीत बनी अहम

*व्ही.एस.भुल्ले*
*विलेज टाइम्स समाचार सेवा।*
चुनावी मौकों पर बात विकास की हो या फिर राष्ट्रबाद की तब तो बात समझ आती है। मगर जब अघोषित तौर पर धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र स्थानीयता के साथ जीत का पैमाना सुनिश्चित हो तो स्वस्थ लोकतंत्र की बात अधूरी रह जाती है और सत्ता स्वार्थ में दल संगठनों की मंशा लोकतंत्र का धुआं उड़ाते साफ नजर आती है। अगर चर्चाओं की माने तो सत्ता के लिए जीत को सुनिश्चित करने टिकट बांटने से लेकर अकूत धन,तकनीक के बल छवि चमकाऊ संस्कृति के गिरोहबंद परिणाम किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो भी हो, सत्ता जिसकी भी बने या रहे यह उस व्यवस्था की समृद्धि, खुशहाली के सपने देखने वालों का दीवाला निकलने के समान है। क्योंकि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में 80 फीसदी लोग सस्ते राशन के मोहताज 5 फीसदी अति स्वार्थी, महत्वकांक्षी और 15 फीसद लोगों का जीवन जिन्दा रहने संघर्षरत हो। ऐसे में जीत के आगे नीति सिद्धान्तों का होता आत्म बल इस बात के स्पष्ट संकेत है कि सेवा भाव कल्याण से अधिक सत्ता अहम हो गई है।
जय स्वराज

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