पुरूषार्थ को लज्जित करती सत्ताओं की सार्थकता साहस, सृजन की शून्यता पर सवाल


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जब विज्ञान में एक कण कारण बन क्रिया उपरान्त सार्थक, प्रभावी, अकल्पनीय परिणाम दे सकता है। तो फिर समाज, राजनीति सत्तायें क्यों नहीं ? अगर हम अपनी महान संस्कृति को देखे तो सार्थक, प्रभावी परिणाम साफ दिखते है। 
देखा जाए तो आज जिस तरह से माता-बहिनों द्वारा घर परिवार में निभाई जाने वाली जबावदेहियों को निभाने में जनप्रतिनिधि, सत्ता, संगठन, सरकारें अक्षम, असफल हो रही है वह कैसे सेवा कल्याण, विकास करेगीं ? आज यहीं यक्ष प्रश्न लोगों के सामने है कि आखिर क्यों हमारी सरकारें, हमारे जनप्रतिनिधि संगठन, सत्ताऐं, माता-बहिनों की जबावदेही निभाने में अक्षम असफल साबित हो रही है। 
अगर भारतीय संस्कृति में झांगे तो परिवार की मुख्य मुखिया व्यवहारिक तौर पर होने के नाते घर की स्वच्छता, अनुशासन, समता, सुरक्षा और समृद्धि सहित सेवा कल्याण में शिक्षा, स्वास्थ पेयजल, रोशनी सहित बेहतर भविष्य, संसाधन जुटाने में अहम भूमिका के साथ सृजन में भी हमारी माता-बहिनों निष्ठापूर्ण अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर विभिन्न जबावदेहियों में अपना हाथ बटाती है। मगर दुर्भाग्य कि हमारी सत्तायें, सरकारें, जनप्रतिनिधि, निरंतर इस अहम जबावदेही में असमर्थ असफल साबित हो रहे है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, मानव सभ्यता पर कलंक है। यहीं चुनावों के दौरान हमारे लिए विचारणीय सवाल है। शायद इस कड़वे सच को हम समझ, सच्चे, अच्छे जनप्रतिनिधि चुन पाए। तो यहीं मानव होने के नाते हमारी सिद्धता होगी।
जय स्वराज 

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