समरथ को कहां, दोष गुसाईं समर्थ, असमर्थो के बीच झूलता लोकतंत्र


व्ही.एस.भुल्ले
अब ऐसे में नारा कोई वंशवाद, परिवार या विचारवाद का बुलंद कर अपनी छवि चमकाने कितना ही, जतन क्यों न करें। मगर सच यहीं है कि इस कलयुग में भी यह कहावत सच साबित हो रही है कि समरथ को कहां दोष गुसांई।
आखिर तुलसीदास जी कितने पहुंचे हुए संत थे कि उसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है जो उन्होंने कलयुग में समर्थ लोगों और स्थिति को लेकर अपनी कल्पना का चित्रण किया था। जो आज भी हूबा-हू सच साबित हो रही है। भले ही आज हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो। मगर वो सच जो समाज और समर्थ व्यक्तियों के बारे स्पष्ट नजर आता है।  
छोटे-मोटे दल, संगठन तो दूर बड़े-बड़े दल भी इस रोग से स्वयं को नहीं बचा सके। परिणाम कि 2018 में जिस तरह से बड़े से बड़ा दल अपना ज्ञान बांट, अपनी सार्थकता लोकतंत्र में सिद्ध करने परिवार, वंशवाद को बांटते घूमते थे आज टिकट वितरण में जिस तरह से परिवार, वंशवाद, धन, बाहुबल, जाति, धर्म, क्षेत्र को लेकर परिदृष्ट लोगों के सामने है। उससे स्पष्ट हो जाता है कि हमारे दल लोकतंत्र को लेकर कितने गंभीर है।
शायद इस कटु सच को होने के नाते समझ पाए और और सेवा की सियासत के बहाने स्वार्थसिद्ध करने सत्ता भोगने वालों को पहचान पायें तो लोकतंत्र में हमारी यहीं सबसे बड़ी सिद्धता एक सजग नागरिक होने के नाते होगी।
जय स्वराज

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