कृतज्ञता, पुरूषार्थ को लज्जित करते दल गोलबन्द, गिरोहों में तब्दील सियासत


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से सत्ता व खातिर की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेवा कल्याण के नाम कृतज्ञता, पुरूषार्थ को विसार जीत को अन्तिम लक्ष्य मान चुनावों में जीत सर्वोपरि हुई है। जिसके लिए दल अब गोलबंद गिरोहों की तरह पुरूषार्थ ही नहीं, कृतज्ञता को भी लज्जित करने पर तुले है। यूं तो लोकतंत्र में इसकी शुरूआत कोई नई नहीं, सेवा कल्याण के नाम यह  शुरूआत तो पहले से ही विरासत में अस्तित्व में है। फिर क्षेत्रीय दल क्या प्रादेशिक राष्ट्रीय दलों ने भी जीत को अपना अंतिम लक्ष्य बना लिया है। जिसके लिए वह अब न तो अपराध, अपराधी, भ्रष्टाचार से लेकर परिवार, वंशवाद, बाहुबली पर विश्वास जताने में भी संकोच नहीं कर रहे है।
ऐसे में भले ही गांव, गली, गरीब, किसान, पीड़ित, वंचित, सस्ते राशन के मोहताज, कुपोषित, अल्पतरक्त, शुद्ध पेयजल की मोहताज आशा-आकांक्षाओं की मईयत निकले या फिर कृतज्ञता, पुरूषार्थ की मजार पर मातम हो। आखिर सत्ता और जीत के आगे नीति, सिद्धान्त, विचारों की परवाह किसवे। बैवसी, गरीबी आज रोती है। सक्षम, समरत होने के बावजूद जवानी निठल्ली सड़कों को घूमती है। पथरा गई वो आंखें जो अपने सुनहरे सपने साकार होते देखना चाहती है। मगर कारण आज भी हम शिक्षित, अशिक्षित होने के बावजूद और संबंधों में उलझ बगैर प्रमाण परिणामों की चर्चा किए बगैर ऐसे दलों को चुनने उत्साहित रहते है। जिनका अंतिम लक्ष्य सिर्फ जीत और जो पुरूषार्थ कृतज्ञता को सम्मानित करने के बजाए लज्जित करने में स्वयं को गौरांवित मेहसूस करते है। मगर यहां विचारणीय बात यह है कि चुनाव का मौसम है और लोकतंत्र का महाकुंभ। अगर ऐसे में हमने सच्चे अच्छे जनप्रतिनिधियों का समझदारी पूर्वक मतदान कर, उन्हें नहीं चुना तो यह हमारी सबसे बड़ी अक्षमता, असफलता, अज्ञानता ही होगी। जो हमारे पुरूषार्थ और कृतज्ञता को कलंकित करने काफी है।  
जय स्वराज

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