हजारों वर्ष की त्याग तपस्या को तिलांजली देते लोग
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए हजारों वर्ष की त्याग-तपस्या संधारित संस्कृति, सिद्धान्त, संस्कारों की ऐसी दुर्दशा होगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जहां तक सेवा कल्याण शान्ति सदभाव, समरसता को साक्षी मान समृद्ध, खुशहाल जीवन का खाका खींचा गया। वहीं आज सेवा कल्याण के नाम स्वयं स्वार्थ सिद्धि में तब्दील है। मगर यक्ष सवाल आज यह है कि समुचा जीव-जगत जहां अपनी संस्कृति, सुसंस्कृत, सुरक्षित, सरंक्षित रखने में कामयाब है। ऐसे में मानव का अपनी संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों से विमुख होना उसके अस्तित्व पर सवाल करने काफी है।
आखिर कब हम अपने अक्स को पहचान अपनी प्रमाणिकता सुनिश्चित कर पायेगें। कब हम अपनी जबावेदही, उत्तरदायित्व समझ अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन निष्ठापूर्ण कर पायेगें। क्योंकि ईश्वर, अल्लाह, ईशू या अन्य धर्मो की सर्वोत्तम कृति, मानव कल्याण व जीव-जगत की सेवा है। अगर जीवन का यहीं मंत्र पथभ्रष्ट होगा तो प्रकृति में कैसे समृद्ध, खुशहाली होगी। जो कि परमपिता की सर्वोत्तम कृति होने के साथ जीवन का सम्पूर्ण सत्य भी है।

Comments
Post a Comment