जनाक्रोश, जनादेश से सबक, सीख जरूरी सत्याग्रह के आगे सिसकी, सत्ता

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  
अगर सियासी, सत्ताधारी दलों ने सत्याग्रह से सीख ली होती, तो उन्हें आज यह सबक जनाक्रोश के चलते जनादेश के रूप में न मिला होता। पूरे 24 घन्टे सत्ता के लिए हार-जीत के आंकड़ों के आगे घिसटते सिसकते दलों ने सपने में भी न सोचा होगा कि उन्हें सेवा कल्याण, विकास के लिए चैकीदार की भूमिका तो मिलेगी और सत्ता का सिहासंन पर बैठने वालों को विश्राम नहीं मिलेगा। जिससे न तो बैखोंफ जन संसाधनों का दुरूपयोग हो सकेगा, न ही सत्ता से गलबईयां कर विपक्ष मौज मस्ती कर सके।
बैसे सत्याग्रह का अर्थ सत्य के लिए आग्रह होता है। शायद न तो सत्ता इस सच को समझ सकी, न ही विपक्ष परिणामों को संतोषजनक स्थिति में बदल सका। फिलहाल तो बदली सत्ता और विपक्ष का चेहरा साफ है। अगर यो कहे कि अब विश्राम कहां कि कहावत चरितार्थ हो तो कोई अतिसंयोक्ति न हो होगी। 

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