सत्ता के आगे समझ, सामर्थ की अनदेखी घातक सत्याग्रह के साथ अन्याय

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  
निश्चित ही काॅग्रेस का भविष्य चुनौती भरा है और 2019 की चुनौती भी उसके सामने है। ऐसे में जहां उसे सत्ता, संगठन, संसाधनों, समर्पित कार्यकत्र्ता, संगठनों, वैचारिक लोगों से निहत्थे अल्प संगठनात्मक संख्या बल तथा साथ ही सियासी सौदेवाजी के दंश के साथ सत्ता के लिए संघर्ष करना है। जिस सामर्थ की दरकार काॅग्रेस संगठन को मजबूत करने और तीन प्रदेशों में जनाक्रोश, सत्याग्रह के सहारे सत्ता पाने अप्रत्याशित सफलता जन आर्शीवाद से मिली है। शायद आलाकमान उस समझ को तो भुना पाया। मगर जिस सामर्थ, समझ की दरकार आम जन, युवा, पीड़ित, वंचित, गांव, गली, गरीब, किसान को थी। उसका वह अपने निर्णय में सटीक प्रदर्शन नहीं कर पाया, न ही वक्त द्वारा दी जा रहे मौके को वह ठीक ढंग से भुना पा रहा। जो काॅग्रेस के लिए आने वाले समय में शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते। 
देखा जाए तो काॅरपोरेट लिमिटेड कल्चर की तर्ज पर विगत 4 वर्षो में संगठित काॅग्रेस न तो नये जमीनी लोग, बुद्धिजीवी, विद्ववान, वक्ताओं को जोड़ सकी, न ही उन्हें सम्मानित स्थान दे सकी और न ही वह कोई ऐसा प्लेट फार्म काॅग्रेस से जुड़ने स्थापित कर सकी जो पारदर्शी जीवन्त हो, सिवाये संगठन खड़ा करने के नाम पर पुराने सिपहसालारों व क्षेत्रों में बटे स्वयंभू क्षत्रपों के वफादार, चाटूकारों की तथाकथित फौज। मगर अफसोस तो तब होता है जब आज भी टी.व्ही चैनलों पर अपरिपक्व अधूरी जानकारियों और तर्क विहीन बहसों को लोक सुनते है और मंचों पर अप्रसंगकित भाषण देते भले ही काॅग्रेस आलाकमान रामलीला मैदान के मंच पर समर्थ, सक्षम, संघर्षशील कार्यकर्ताओं को स्थान देने की बात करते हो या फिर राजनीति में स्काईलेब संस्कृति से संगठन या सत्ता में स्थापित होने का विरोध करते हो। मगर वह दोनों ही स्थिति में नाकामयाब हुए। 
कारण साफ है कि समझ के साथ सामर्थ का प्रदर्शन उतना बेहतर नहीं हुआ। जिसकी कि काॅग्रेस के रूप में दरकार थी। जिस कमी का लाभ उठा जहां विपक्षी दल सत्ता में होने के बावजूद जबदरस्त मनगणंत हमले करने में कामयाब रहते है। तो वहीं दूसरी ओर दल के अन्दर भी ऐसे सियासी लोग जो विपक्ष से गलबईयां कर सत्ता सुख का लाभ उठाते है और आलाकमान की मजबूरी का भी लाभ उठाने से भी नहीं हिचकते। 
बहरहाल म.प्र. में सत्याग्रह को धार देने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री सिंधिया जैसे नेता जिसने अकेले ही विगत 15 वर्षो तक स्वयं को काॅग्रेस का सच्चा सिपाही, तो कभी सच्चा सत्याग्रही बता सत्ताधारी दल से संघर्ष किया और काॅग्रेस को जिन्दा रखने का काम किया, तब न तो म.प्र. की राजनीति में 10 वर्ष का राजनैतिक सन्यास भोगने वाले सन्यासी थे, न ही म.प्र. में काॅग्रेस का कोई नाथ। बहरहाॅल आज की चुनौती भरी सियासत में जरूरत तो सभी की होती है। मगर सभी का सम्मान हो और न्याय हो, यह आलाकमान को समझने वाली बात है। बरना जो संदेश म.प्र. की राजनीति में सिंधिया को संगठन या सत्ता से दरकिनार करने को लेकर जा रहा है वह 2019 के लिए म.प्र. ही नहीं, देश भर में काॅग्रेस के लिए शुभसंकेत नहीं।

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