क्या सच होगा, राहुल का सपना कब खत्म होगा, सत्ता और सत्याग्रह का संघर्ष

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि राहुल के सपनों में सियायत कम और सच ज्यादा होता है। कारण कि वह स्व. पंण्डित नेहरू, स्व.इन्दिरा गा़ंधी और स्व. राजीव गांधी तथा श्रीमती सोनिया गांधी के पुत्र है। जिन्होंने कभी भी राष्ट्र व जन की खातिर, सत्ता को तरजीह नहीं दी।
स्व. नरसिंह राव से लेकर, डाॅ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार को राष्ट्र, जनहित में स्वीकार कर, देश के लगभग 80 करोड़ लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार, सूचना का संवैधानिक अधिकार दिलाने के बाद खादय अधिकार के लिए बीमार होने के बावजूद भी सदन की कार्यवाही में उपस्थित रहने वाली सोनिया गांधी ने कभी भी सत्ता को तरजीह नहीं दी, न ही मनमोहन सरकार के समय अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाले प्रस्तावित बिल को फाड़ने वाले राहुल ने तरजीह दी। अगर राहुल गांधी चाहते तो वह उस वक्त कभी भी प्रधानमंत्री बन सकते थे। मगर उन्होंने उस वक्त भी सत्ता के बजाए संघर्ष को चुना और गांव, गली, गरीब, किसान, पीड़ित, वंचितो की आवाज को बुलंद किया। इतना ही नहीं उन्होंने रामलीला मैदान के मंच से यह घोषणा भी सरेआम की हैं मंच उन संघर्षशील नेता, कार्यकर्ताओं के लिये खाली रखा गया है और अब आसमान से उतरने वाले नेता नहीं चलेंगे।यह उनके सपने का सच बताने काफी है। जो लोग राहुल के सपनों पर शक करते है, उन्हें यह समझने काफी है।
रहा सवाल सत्ता और सत्याग्रह के संघर्ष का तो जहां राहुल ने सत्य के आग्रह के लिए पूरी प्रमाणिकता सिद्ध की है। तो वहीं उनके सिपहसालार टीएन सिंहदेव, सचिन से आगे जा सिंधिया ने भी सत्ता के बजाए सत्याग्रह के रास्ते स्वयं के सपनों को दरकिनार आम आशा-आकांक्षाओं की खातिर सत्ता की कुर्बानी दी है जो 15 वर्ष तक दल के अन्दर बाहर विरोधी दल से संघर्ष कर सत्याग्रह को अपना सियासी हथियार बना आज भी राहुल के सपने पूरे करने संघर्षरत है। देखना होगा कि सिंधिया जैसे राहुल के सिपहसालारों का सत्य के लिए आग्रह क्या पूरा होगा ? यह काॅग्रेस आलाकमान को समझने वाली बात है।
जय स्वराज

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