सत्ता की लूट से आहत, आशा-आकांक्षाऐं फिर बगावत को तैयार सत्ता के आगे कौन समझे इन बेजुबानों की जुबान
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विगत दिनों जिस तरह से सत्ता का स्वरूप बदलने आशा-आकांक्षाओं ने बूथ लेवल तक पहुंच निजाम बदलने का कार्य किया और आक्रोशित दिखी, शायद उनके पास आज अफसोस के अलावा कुछ शेष नहीं। क्योंकि जिन चेहरों के चलते काॅग्रेस ने 15 वर्ष का वनवास झेला और आशा-आकांक्षाओं ने 25 वर्ष तक कष्ट झेला, शायद वह आज मायूस हो।
क्योंकि जिस तरह से विगत दिनों से सत्ता का बंटवारा टुकड़ा दर टुकड़ा हो रहा है और सक्षम मुखिया होने के बावजूद भी वह स्वार्थवत लोगों को झेल रहा है उसका परिणाम जो भी हो। मगर इतना तय है कि जनाक्रोश के रथ पर लहराती सत्ता की पताकाऐं जिस तरह से नौंची जा रही है। अगर यहीं हाल रहा तो 2019 में परिणाम अप्रत्याशित हो, तो किसी को अति संयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
देखा जाए तो उम्मीद तो आम आशा-आकांक्षाओं को तो यह थी कि अहम, अहंकार, भ्रष्टाचार में डूबी सेवाभावी सरकार को सबक सिखाने के साथ जो भी नया सत्ता में आयेगा वह समृद्ध, खुशहाल जीवन के साथ बेजुबान गौवंश की जुबान समझ उनका भी कल्याण करेगा और सत्ता का व्यवहार आशा-आकांक्षाओं के अनुरूप होगा। मगर किसानों की कर्ज माफी के बाद मंत्री पद की लूट-पाट में व्यस्त दल का आलम यह है कि वह न तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज पर विचार करने तैयार है, न ही गांधी के सबसे बड़े अस्त्र सत्याग्रह पर चलने तैयार और न ही जिस गौवंश की सुरक्षा सम्बर्धन के लिए हर पंचायत में गौशाला खोलने का वचन हुआ था उस पर भी अमल करने तैयार है।
अगर यो कहे कि सत्ता का मिजाज ही अहम, अहंकार, निहित स्वार्थी होता है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। अगर म.प्र. में फ्री हेन्ड काॅग्रेस को भी मात्र दो चार महीनों में ही अपने कृत्यों का परिणाम भोगना पड़े, जिस तरह से भाजपा की 15 साला सरकार ने भोगा है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। जिसकी संभावना सत्याग्रह को तिलांजली दें, सत्ता भोगने वालों के, सत्ता में हावी रहते प्रबल है।
ऐसे में यक्ष सवाल यही है कि क्या काॅग्रेस आलाकमान इस पर काबू पा पायेगा जिसके लिए काॅग्रेस या गांधी परिवार को जाना जाता है। फिलहाल तो सत्ता का अक्स स्पष्ट है और जनता का मत भी स्पष्ट। जिसने समय-समय पर कई सत्तासीनों के मुगालते फागता करने में कभी कोई कोताही नहीं बर्ती। देखना होगा कि आने वाला कल कैसा होगा।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विगत दिनों जिस तरह से सत्ता का स्वरूप बदलने आशा-आकांक्षाओं ने बूथ लेवल तक पहुंच निजाम बदलने का कार्य किया और आक्रोशित दिखी, शायद उनके पास आज अफसोस के अलावा कुछ शेष नहीं। क्योंकि जिन चेहरों के चलते काॅग्रेस ने 15 वर्ष का वनवास झेला और आशा-आकांक्षाओं ने 25 वर्ष तक कष्ट झेला, शायद वह आज मायूस हो। क्योंकि जिस तरह से विगत दिनों से सत्ता का बंटवारा टुकड़ा दर टुकड़ा हो रहा है और सक्षम मुखिया होने के बावजूद भी वह स्वार्थवत लोगों को झेल रहा है उसका परिणाम जो भी हो। मगर इतना तय है कि जनाक्रोश के रथ पर लहराती सत्ता की पताकाऐं जिस तरह से नौंची जा रही है। अगर यहीं हाल रहा तो 2019 में परिणाम अप्रत्याशित हो, तो किसी को अति संयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
देखा जाए तो उम्मीद तो आम आशा-आकांक्षाओं को तो यह थी कि अहम, अहंकार, भ्रष्टाचार में डूबी सेवाभावी सरकार को सबक सिखाने के साथ जो भी नया सत्ता में आयेगा वह समृद्ध, खुशहाल जीवन के साथ बेजुबान गौवंश की जुबान समझ उनका भी कल्याण करेगा और सत्ता का व्यवहार आशा-आकांक्षाओं के अनुरूप होगा। मगर किसानों की कर्ज माफी के बाद मंत्री पद की लूट-पाट में व्यस्त दल का आलम यह है कि वह न तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज पर विचार करने तैयार है, न ही गांधी के सबसे बड़े अस्त्र सत्याग्रह पर चलने तैयार और न ही जिस गौवंश की सुरक्षा सम्बर्धन के लिए हर पंचायत में गौशाला खोलने का वचन हुआ था उस पर भी अमल करने तैयार है।
अगर यो कहे कि सत्ता का मिजाज ही अहम, अहंकार, निहित स्वार्थी होता है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। अगर म.प्र. में फ्री हेन्ड काॅग्रेस को भी मात्र दो चार महीनों में ही अपने कृत्यों का परिणाम भोगना पड़े, जिस तरह से भाजपा की 15 साला सरकार ने भोगा है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। जिसकी संभावना सत्याग्रह को तिलांजली दें, सत्ता भोगने वालों के, सत्ता में हावी रहते प्रबल है।
ऐसे में यक्ष सवाल यही है कि क्या काॅग्रेस आलाकमान इस पर काबू पा पायेगा जिसके लिए काॅग्रेस या गांधी परिवार को जाना जाता है। फिलहाल तो सत्ता का अक्स स्पष्ट है और जनता का मत भी स्पष्ट। जिसने समय-समय पर कई सत्तासीनों के मुगालते फागता करने में कभी कोई कोताही नहीं बर्ती। देखना होगा कि आने वाला कल कैसा होगा।
Comments
Post a Comment