जनता की जीत पर, लम्बरदारों में लट्टम लट्ठा किसान, युवा को फाॅरमूले नहीं, तत्काल राहत और स्थाई रोजगार चाहिए

व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जनता की जीत पर सवार लम्बरदारों में सत्ता के लिए इस कदर लट्टम लट्ठा होगा। अहम, अहंकार भ्रष्टाचार पीड़ित, गांव, गली, गरीब, किसान, युवा, बेरोजगार और म.प्र. की आशा-आकांक्षाओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस जनाक्रोश के चलते काॅग्रेस की झोली में अधूरी जीत आ गिरी है और जिस तरह से सत्ता बंटवारे को लेकर घमासान मचा है वह काॅग्रेस के लिए शर्मनाक भी होना चाहिए और दर्दनाक भी। जिस फूट डालों शासन करो की नीति को आज बड़ी-बड़ी सत्तायें, संगठन, अलाउद्दीन का चिराग समझ, अपने निजाम को जिन्दा रखने की संजीवनी मानते है उन्हें पुनः यह समझना आवश्यक है कि जिन्दा कोमों के देश में इस तरह की नीतियां न तो कभी सार्वजनिक तौर पर सफल रही है, न ही प्राशासनिक और राजनैतिक तौर पर। उक्त बात स्वराज के मुख्य संयोजक व्ही.एस.भुल्ले ने नव गठित सरकार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कही। ज्ञात हो कि स्वराज न तो कोई राजनैतिक दल है, न ही संगठन सिर्फ एक विचार है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से नव गठित मंत्रीमंडल में समृद्ध, खुशहाल म.प्र. के लिए नये-नये फाॅरमूले सुझाये जा रहे है वह सिर्फ समझ का दीवालियापन ही नहीं, उस सत्ता और जनादेश का भी अपमान है। जिसने अपनी समृद्धि, खुशहाली के लिए 15 साल पुरानी सेवाभावी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंका। 
मगर जिस तरह का आचरण, व्यवहार नव गठित सत्ता सरकार और लंबरदारों में बंटे संगठन का आम जन मानस देख रहा है वह काॅग्रेस के लिए शुभसंकेत नहीं। अगर काॅग्रेस की नव गठित सरकार गौशाला, रोजगार, सस्ती सुलभ शिक्षा, स्वास्थ, शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में असफल, अक्षम साबित हुई। जिसकी संभावना नव गठित मंत्रीमंडल की पहली बैठक में विचार उपरान्त लोगों के सामने है काॅग्रेस के लिए शुभसंकेत नहीं। 
जबकि अगर काॅग्रेस सरकार चाहती तो सत्ता बंटवारे के सरेयाम चैराहे पर चल रहे खेल से इतर उन विधा-विद्ववानों के साथ भी विचार-विमर्श करती। जिसे उन्होंने अपने वचन पत्र में जन आयोग का नाम दिया है। सरकार चाहे तो मात्र एक माह के अन्दर लगभग 2 लाख लोगों को स्थाई रोजगार से लगाने के अलावा पशुधन संरक्षण, शुद्ध पेयजल, सस्ती सहज शिक्षा, स्वास्थ के पुख्ता इन्तजाम कर सकती है। मगर सरकार के हालियां हालातों के मद्देनजर नहीं लगता कि वह सत्ता बंटवारे से इतर वह एक माह में बहुत कुछ कर पायेगी। फिलहाल तो हताशा-निराशा के दौर से गुजरता युवा, किसान को आने वाले दिनों में प्रमाणिक तौर पर क्या हासिल होगा। यह उसकी अनुभूति का स्तर तय करेगा। 

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