संस्कृति से वंचित सत्तायें कभी समृद्ध, सक्षम नहीं होती

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर जहाज, चौपर, लग्झरी वाहनो में सवार सियासी दल गांधी, शहीद भगत सिंह, आजाद, सुभाष चन्द्र बोस सहित पंण्डित नेहरू, पटेल, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय, इन्द्रा गांधी की त्याग तपस्या को नहीं समझ पा रहे तो यह हमारी महान मातृभूमि की महान संस्कृति के लिए दर्दनाक है। जिस तरह से बगैर प्रमाणिक तथ्यों को गरिमापूर्ण पदों पर कीचड़ उछालने की संस्कृति समृद्ध हो रही है वह इस महान भू-भाग के लिए शर्मनाक है। 
अब यहां यक्ष सवाल यह है कि आखिर ऐसा इस महान भू-भाग पर क्यों रहा है। तो इसका सीधा सा जबाव है कि सत्ता, सरकारों के लिए जिस कीमत पर जो तिलिस्म महान संस्कृति को तिलांजली दें, तैयार किया जा रहा है वह न तो इस महान राष्ट्र, सत्तासीन या  सत्ता हथियाने घात लगाए बैठे लोगों के, न ही जिनके लिए सत्तायें अस्तित्व में होती है उनके हित में है और न ही किसी धर्म, पथ सहित क्षेत्र, भाषा, जाति की ध्वजा पताका लिए लहराने वालो के हित में है न ही इस महान राष्ट्र के गांव, गली, गरीब के हित में। क्योंकि जिस अशान्ति, अराजकता के रथ पर सवार हम आज सत्ता की जंग जीतने आतुर है। उससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है और न ही वह मार्ग किसी भी लक्ष्य की ओर जाता है, बल्कि उस मार्ग की ओर जाता है जो अनन्त है। 
बेहतर हो कि हम अपनी विरासत को साक्षी मान वर्तमान भविष्य को सवारने अपनी संस्कृति को अखण्ड अक्षुण रख उन लोगों की तकदीर सवारें जिनकी आशा-आकांक्षा आज भी पथराई आंखों से अपने समृद्ध, खुशहाल जीवन व भविष्य को खोज रहीं है। 
जय स्वराज

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