दलों के दंश से कराहता देश अस्तित्व की जंग में अनुभूति, आशा-आकांक्षाओं का कत्लेयाम बेहतर नीतियां, सकारात्मक सोच, प्रमाणिक क्रियान्वयन के आभाव में कलफता सेवा, विकास, कल्याण

व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।   
देश में एक से बढ़कर एक नीतियां, समर्पित नेतृत्वों के रहते सकारात्मक सोच और प्रमाणिक क्रियान्वयन के आभाव में जिस तरह से आशा-आकांक्षा अनुभूति का सरेयाम कत्लेयाम हुआ है उसके चलते बेहतर नीतियां समर्पित नेतृत्वों पर सवाल होना स्वभाविक है। तो वहीं दलों के दंश से समूचा देश कराहने पर मजबूर है। जो त्याग-तपस्या ही नहीं, उन सदपुरूषों सहित इस तंत्र के लिए भी शर्मनाक और दर्दनाक है। जिनका सम्पूर्ण समर्पण राष्ट्र व जनकल्याण में समर्पित रहा है। 
कारण प्रमाणिक सांख्यकिय आंकड़े सहित निःस्वार्थ समर्थ ज्ञान का आभाव और अस्तित्व के लिए वैचारिक उन्माद तथा संगठनों के नाम स्वार्थ समूहों के स्वार्थ महत्वकांक्षाओं की जंग में दम तोड़ती गांव, गली, गरीब, किसान की आशा-आकांक्षाऐं, अनुभूूति इस बात की गवाह है कि देश के गांव, गली, गरीब, किसान ही नहीं, मध्यम वर्ग के कल्याण के लिए एक से बढ़कर नीतियां तो बनी। मगर वह दलों के दंश के चलते फली-भूत नहीं हो सकी। जिसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। क्योंकि जिस देश में 30 फीसदी युवाओं की भीड़ हो और लोग रोजगार के मोहताज इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है और सत्ता के लिए करने के लिए कौन से लक्ष्य। 
देखा जाये तो अगर केन्द्र व राज्य सरकारें चाहती, तो देश के वे काम बेरोजगार लगभग 2 करोड़ लोगों को मात्र 3 माह के अन्दर स्थाई रोजगार दिया जा सकता था। उसी अनुपातः में राज्य सरकारें भी अपने प्रदेश के नौनिहालों को सम्मानजनक, सृजनात्मक, स्वीकार्य रोजगार बगैर अतिरिक्त धन खर्च करे मुहैया करा सकती थी। मगर वैचारिक दलगत, दंश ने ऐसा होने नहीं दिया, न ही संगठन के नाम स्वार्थवत इकट्ठे समूहों ने ऐसा कोई प्रयास किया जिससे सत्ता को मजबूर किया जा सके। काश अपने अपनों को उकृत और यसमेनों की समझ से इतर कुछ हो पाता तो देश में व्यापक संभावनाओं और सर्वकल्याण के प्रमाण अनुभूति पूर्ण होते और सृजनात्मक समझ और बहुमूल्य समय का सदपयोग अराजकता, अहम, अहंकार की शिकार नहीं हो पाती। 
कहते है कि जिस देश या सत्ता में समझ, समझने और सपने साकार करने वालों की जमात में मूर्खो का बोल-वाला बढ़ जाए और भावी सपने वैचारिक उन्माद का शिकार हो जाए वह राजा और सत्ता हमेशा सृजन व सर्वकल्याण से वंचित ही रहते है। फिर वह कितने ही समृद्ध, शक्तिशाली क्यों न हो। कहते है कि शासक व राजा देवतुल्य होते है जिसका आधार उसके आचरण, व्यवहार, सोच और उसके सदकर्म की स्थिरता अर्थात राजधर्म के ज्ञान पर निर्भर होता है। जो उसे हर क्षण यह ज्ञात कराने साक्षी बना रहता है कि उसकी जबावदेही और कत्र्तव्य क्या है और एक शासक या राजा के रूप में उसका अन्तिम लक्ष्य क्या है ? 
आज पीड़ितों, वंचितों से भरे देश के सामने दो ही रास्ते है वैचारिक उन्माद, तो दूसरा संगठन के नाम स्वार्थवत समूहों का झंुण्ड। ऐसे में फैसला देश को करना होता है। कहते है कि जनता भले ही पीड़ित, वंचित, आभावग्रस्त, कभी भी इस महान भू-भाग पर रही हो। मगर उसके फैसलों पर सवाल हमेशा से ही बैमानी साबित होते रहे है इतिहास और वर्तमान गवाह है।
जय स्वराज 

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