सेवा, सत्याग्रह-सत्ता और संचालन से बाहर क्रूर सियासत का शिकार शिव और सिंधिया

व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
विगत एक दशक से म.प्र. में शिव की सेवा और सिंधिया के सत्याग्रह के बीच चले घमासान का ऐसा अंत होगा किसी ने सपने में भी न सोचा होगा, न ही रीति-नीति, मूल्य, सिद्धान्तों की सियासत में दखल रखने वाले सियासी पंडितों ने सोचा होगा। आज समूची म.प्र. की सियासत ही नहीं, सियासी मठाधीस भी हैरान-परेशान हो, तो काई अति संयोक्ति न होगी।
जहां न तो सेवा का कोई मूल्य रहा, न ही सत्य के आग्रह को क्रूर, सियासत ने सुना। मगर दिलचस्व यह होगा कि जिस जनाक्रोश के रथ पर विजय पताका लहरा जो लोग पीड़ित, वंचित, गांव, गली, गरीब, किसान, बेरोजगारों के कल्याण उनकी सेवा विकास का शंख फूकने आतुर जान पड़ते है। उनकी सतरंगी सेना के संभावित सिपहसालारों के नाम और राजभवन सहित श्यामला हिल्स शिवाजी नगर के मुख्यालय पर चित्र देख-देख हैरान-परेशान है और सेवा तथा सत्याग्रह फिलहाल सनाके में।
देखा जाए तो स्वयं को सेवक के रूप में स्थापित करने वाले अब चैकीदारी के मूड़ में, तो वहीं दूसरी ओर म.प्र. की राजनीति में सत्याग्रह को धार देने वाले शान्त है। देखना होगा कि सत्ता के लिए क्रूर सियासत के शिकार म.प्र. की राजनीति के ये दो ध्रुरूप आक्रोशित जनादेश को क्या दिशा दे पाते है। जिससे लोगों की समृद्धि, खुशहाली सुनिश्चित हो और लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल बन सके। 

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