राष्ट्रद्रोह का मंच बनता, बेजा सियासी विरोध

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह का मार्ग, गिरोहबन्द तथाकथित सियासी संगठनों ने सत्ता हासिल करने या विरोधी संगठनों को नीचा दिखाने स्वयं को स्वच्छ बेदाग साबित करने का शुरू हुआ है। वह न तो जन, राष्ट्र हित में हैं न ही 80 करोड़ के लगभग सस्ते राशन के मोहताज 30 फीसदी बेरोजगार हाथ और आधे से अधिक अल्परक्त की शिकार आशा-आकाशाओं के हित में है। अपने सियासी कलंक छिपाने दूसरे के मुंह पर कालिख पोत अराजकता को आमंत्रण देती सियासत किसी का भला नहीं करने वाली।
जिस राष्ट्र में शैक्षणिक, वौद्धिक, प्रतिभा सम्पन्न मानव संसाधन खुली हवा का मोहताज हो और मानव शक्ति बेकाम ऐसे में आवश्यकता राष्ट्र को सम्हालने के साथ मौजूद संसाधनों के बल ऐसा आधार भूत ढांचा खड़ा करने की है, जिससे पीड़ित, वंचित लोगों सहित गांव, गली, गरीब, किसान का जीवन स्वाभिमानी समृद्ध, खुशहाल बन सके और खाली हाथों को रोजगार मिल सके। क्योंकि वक्त सब देख रहा है और जनता जनार्दन शान्त है। अगर ऐसा ही निहित स्वार्थो की खातिर सियासत में चलता रहा। तो यह इस महान राष्ट्र के लिए दर्दनक होगा और एक महान संस्कृति के लिए शर्मनाक।

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