वादों के ब्रह्मास्त्र से, 2019 फतह की तैयारी हर गरीब को राहुल का न्यूनतम आय का वादा सिंधिया और प्रियंका को चुनौती पूर्ण जबावदेही
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस प्रदेश में उसके सहयोगी दल ही काॅग्रेस की उपयोगिता पर उसे गठबंधन से बाहर रख सवाल खड़े करते हो और धुर विरोधी सत्ताधारी दल उसकी भूमिका 2019 में स्वीकारने तैयार न हो। ऐसे प्रदेश की बागडोर सिंधिया और प्रियंका को प्रभारी के रूप में सौंपना दोनों के लिए चुनौती पूर्ण जबावदेही है।
शायद राष्ट्र की कभी संभावना सच थी कि स्व. इन्दिरा के बाद देश का क्या होगा। मगर एक बहिन के कत्र्तव्य निर्वहन और इस राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हर गरीब को न्यूनतम आय देने के संकल्प के बीच देश की आशंका कि स्व. इन्दिरा के बाद क्या होगा, पर आज सियासी हल्कों में चर्चा यक्ष है। मगर देखना होगा कि गिरोहबन्द सियासी संस्कृति के चलते वर्तमान में देश का भविष्य कैसा होगा यह आज समझने वाली बात होना चाहिए। जिस तरह से सत्याग्रह के सार्थी सिंधिया को नई जबावदेही के साथ म.प्र. से उत्तरप्रदेश विदा किया गया है और पीड़ित, वंचित, आभावग्रस्तों के बीच सिंधिया के पद को बढ़ाने का ऐलान हुआ है उस पर सियासी सवालों का होना लाजमी है। यूं तो स्वार्थवत सत्ताओं और सियासी लोगों की पहली पसन्द आजकल जनभावना, जनाकांक्षाओं से इतर स्वार्थ सिद्धि की रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन लोगों ने अपना अमूल्य मत देकर जिस सत्ता संगठनों में विश्वास व्यक्त किया है। आज उनके प्रमाणिक परिणाम क्या है। ऐसी सियासत के बीच राहुल के नये सार्थियों की चुनौती पूर्ण मोर्चो पर तैनाती और स्वयं राहुल का वादा पूर्ण यह ब्रह्मास्त्र कि अगर काॅग्रेस केन्द्रीय सत्ता में आई तो हर गरीब को न्यूनतम आय दी जायेगी।
देखना होगा कि काॅग्रेस के इस नये कदम और षड़यंत्रकारी सियासी लोगों के बीच काॅग्रेस को कितनी सफलता मिल पाती है। जो 5 वर्ष पश्चात ही अपने सहज, सम्मानजनक संवाद, सम्पर्क, मार्ग खोलने में अक्षम, असफल साबित हुई है। अगर काॅरपोरेट कल्चर के बीच काॅग्रेस की संस्कृति इसी तरह परवान चढ़ती रही तो 2019 का समर जीतना उसके लिए नमुमकिन ही नहीं, बड़ा मुश्किल होगा। क्योंकि भारत की आत्मा जीवन्त भावनाओं में बसती है, न कि इन्टरनेट, सोशल मीडिया और स्वार्थवत सलाहकार, चापलूस और षड़यंत्रकारियों के बीच जिनका पहला और अन्तिम लक्ष्य सत्ता सुख उठाना और सत्ता की आढ़ में धन कमा अपनी मंशा को पूर्ण करना होता है। यहीं बात आज काॅग्रेस ही नहीं, राहुल गांधी को भी समझने वाली होना चाहिए और इसी बात को समझ, प्रियंका और सिंधिया को उत्तरप्रदेश जैसे जीवन्त प्रदेश में काॅग्रेस की एक नई शुरूआत करना चाहिए। देखना होगा कि काॅग्रेस कितनी सजग और सफल हो पाती है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस प्रदेश में उसके सहयोगी दल ही काॅग्रेस की उपयोगिता पर उसे गठबंधन से बाहर रख सवाल खड़े करते हो और धुर विरोधी सत्ताधारी दल उसकी भूमिका 2019 में स्वीकारने तैयार न हो। ऐसे प्रदेश की बागडोर सिंधिया और प्रियंका को प्रभारी के रूप में सौंपना दोनों के लिए चुनौती पूर्ण जबावदेही है। शायद राष्ट्र की कभी संभावना सच थी कि स्व. इन्दिरा के बाद देश का क्या होगा। मगर एक बहिन के कत्र्तव्य निर्वहन और इस राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हर गरीब को न्यूनतम आय देने के संकल्प के बीच देश की आशंका कि स्व. इन्दिरा के बाद क्या होगा, पर आज सियासी हल्कों में चर्चा यक्ष है। मगर देखना होगा कि गिरोहबन्द सियासी संस्कृति के चलते वर्तमान में देश का भविष्य कैसा होगा यह आज समझने वाली बात होना चाहिए। जिस तरह से सत्याग्रह के सार्थी सिंधिया को नई जबावदेही के साथ म.प्र. से उत्तरप्रदेश विदा किया गया है और पीड़ित, वंचित, आभावग्रस्तों के बीच सिंधिया के पद को बढ़ाने का ऐलान हुआ है उस पर सियासी सवालों का होना लाजमी है। यूं तो स्वार्थवत सत्ताओं और सियासी लोगों की पहली पसन्द आजकल जनभावना, जनाकांक्षाओं से इतर स्वार्थ सिद्धि की रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन लोगों ने अपना अमूल्य मत देकर जिस सत्ता संगठनों में विश्वास व्यक्त किया है। आज उनके प्रमाणिक परिणाम क्या है। ऐसी सियासत के बीच राहुल के नये सार्थियों की चुनौती पूर्ण मोर्चो पर तैनाती और स्वयं राहुल का वादा पूर्ण यह ब्रह्मास्त्र कि अगर काॅग्रेस केन्द्रीय सत्ता में आई तो हर गरीब को न्यूनतम आय दी जायेगी।
देखना होगा कि काॅग्रेस के इस नये कदम और षड़यंत्रकारी सियासी लोगों के बीच काॅग्रेस को कितनी सफलता मिल पाती है। जो 5 वर्ष पश्चात ही अपने सहज, सम्मानजनक संवाद, सम्पर्क, मार्ग खोलने में अक्षम, असफल साबित हुई है। अगर काॅरपोरेट कल्चर के बीच काॅग्रेस की संस्कृति इसी तरह परवान चढ़ती रही तो 2019 का समर जीतना उसके लिए नमुमकिन ही नहीं, बड़ा मुश्किल होगा। क्योंकि भारत की आत्मा जीवन्त भावनाओं में बसती है, न कि इन्टरनेट, सोशल मीडिया और स्वार्थवत सलाहकार, चापलूस और षड़यंत्रकारियों के बीच जिनका पहला और अन्तिम लक्ष्य सत्ता सुख उठाना और सत्ता की आढ़ में धन कमा अपनी मंशा को पूर्ण करना होता है। यहीं बात आज काॅग्रेस ही नहीं, राहुल गांधी को भी समझने वाली होना चाहिए और इसी बात को समझ, प्रियंका और सिंधिया को उत्तरप्रदेश जैसे जीवन्त प्रदेश में काॅग्रेस की एक नई शुरूआत करना चाहिए। देखना होगा कि काॅग्रेस कितनी सजग और सफल हो पाती है।
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