सत्ता उघोग में तब्दील लोकतंत्र में निढाल होते प्रतिभा, संपदा, आशा-आकांक्षा हायर-हाईटेक लोकतंत्र में दम तोड़ता स्वराज

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
कहते है कि जो कौम न तो अपने विधान की रक्षा कर पाए, न ही स्थापित संविधान की मंशानुरूप अपने कत्र्तव्य जबावदेहियों का निर्वहन कर पाए। ऐसी व्यवस्था में गांव, गली में स्वराज का सपना तो दूर की कोणी है ही। बल्कि वह कौम अपनी आशा-आकांक्षाओं के अनुरूप जीवन निर्वहन से भी महरूम हो जाती है। फिर वह व्यवस्था राजतांत्रिक हो या फिर लोकतांत्रिक। 
मगर यह चर्चा हमें उस महान लोकतंत्र की करना, उचित होगा, जो सनातन था, है, और रहेगा। फिर स्वरूप उसका जो भी रहे। जिसमें राष्ट्र जन जीव कल्याण सेवा को ही सर्वोच्च स्थान रहा है। जो समय-समय पर सराहा भी गया और स्वीकार्य भी रहा है। मगर आज जब हम हायर-हाईटेक लोकतंत्र की उपेक्षा के चलते आभावग्रस्त जीवन जीने पर मजबूर है और सेवा कल्याणकारी सत्ताऐं उघोग में तब्दील जहां सत्ता हासिल करने या तो संगठित गिरोह के रूप में तथाकथित दल, संगठन, काॅरपोरेट कल्चर में तब्दील हो, फिर उनका संगठनात्मक वैचारिक आधार जो भी हो। उनका उद्देश्य सार्वजनिक हो या व्यक्तिगत। मगर सामने मौजूद लोकतांत्रिक कृत्य इस बात के गवाह है कि उनके लक्ष्य सृजन से अभी भी काफी दूर है। दुर्भाग्य कि आज हमारी शिक्षा जहां प्रतिभा निर्माण से लेकर हमारे सामाजिक, व्यवहारिक सरोकारों को संस्कार देने में अक्षम, असफल साबित हो रही है। तो वहीं हमारा विधान सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, संस्थान, बेहतर संस्कार, संसाधन देने में अक्षम है। 
हालात ये है कि मौजूद संपदा प्रतिभा या तो बेकार पड़ी है या फिर पलायन कर रही है। विकल्प के आभाव में बैवस संपदा प्रतिभा आज दम तोड़ रही है यह कहना अति संयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। कारण उघोगों में तब्दील सत्ताओं में न तो अब कोई चिन्तन बचा है न ही उन्हें कोई चिन्ता। स्वार्थवत सत्ता के जमघट में सेवा कल्याण अचेत पड़ा है। जिसके मूल में जीवन्त, सार्थक निर्वाचन प्रक्रिया का आभाव ही है। जिसके चलते तथाकथित गिरोहबंद दलों का वैचाारिक आधार अब सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्त कर, स्वार्थ सिद्ध कर, अपने अहम अहंकार अनुरूप सत्ता का संचालन और पुनः सत्ता प्राप्ति बचा है। 
कौन नहीं जानता कि जब निर्वाचन की जबावदेही निभाने वाली संस्था ही निर्वाचन का आवेदन शुल्क व लाखों रूपया चुनाव में खर्च करने की सीमा निर्धारित कर, उसे जायज ठहराती हो और सत्ताऐं चुनने वाला समाज, वर्ग, अर्थ युग का मोहताज। जहां हर नागरिक कम समय में अपनी गुणवत्ता, क्षमता के विरूद्ध ऐसो आराम उपभोग चाहता हो। वहीं अघोषित रूप से गिरोहों में तब्दील तथाकथित दल, संगठन स्वयं के संचालन का चुनावों में लाखों करोड़ों रूपया घोषित, अघोषित तौर पर खर्च कर अकल्पनीय धन जीत के लिए खर्च करने का मादा रखते हो और 80 करोड़ से अधिक सस्ते राशन के मोहताज लोगों के बीच निर्वाचन सिर्फ और सिर्फ सेवा कल्याण के नाम सत्ता के बुत के अस्तित्व के आगे लोकतंत्र का नगाड़ा कितनी ही जोर से क्यों न ठोका जाए, उसमें से सृजन, सेवा, कल्याण, संरक्षण, सम्वर्धन के सुर निकलने वाले नहीं। 
जो देश के शिक्षित, अशिक्षित, सक्षम समझदार 75 फीसदी युवा पीढ़ी को समझने वाली बात है। हमेशा से हर प्रतिभा को अपने शासक, सत्ता, सरकारों, समाज के मुखियाओं से संरक्षण की दरकार सृजन, सेवा कल्याण में अनादिकाल से रही है। जिसे अपना धर्म या राजधर्म या मानव धर्म मान, यह संस्थायें अपने कत्र्तव्य और जबावदेहियों का निर्वहन अनादिकाल से करती रही है। 
जिस संस्कृति ने इस महान राष्ट्र को एक से बढ़कर एक विधा, विद्ववान, वैज्ञानिक, वैचारिक लोग दिए उसी संस्कृति, राष्ट्र में शुल्क संस्कृति का प्रभावी हो जाना इस महान राष्ट्र के गांव, गली, आशा-आकांक्षायें ही नहीं, उस महान समाज, संस्कृति, राष्ट्र के लिए घातक ही नहीं दर्दनाक, शर्मनाक भी है। आज जिस शुल्क संस्कृति का टीका लगा अंग्रेजीयत का तमगा बुलन्द कर हमारी सत्तायें, सरकारें इठलाती नहीं थकती वह आज भी आजाद देश में गुलामी का ही प्रतीक माना जायेगा। 
काश अहम, अहंकार, स्वार्थ से इतर हम और हमारे तथाकथित सेवक इस कटु सच को समझ पाये तो यह हमारे लिए मानव होने के नाते सबसे बड़ी सार्थकता और सिद्धि होगी। जो अर्थ और स्वार्थ युक्त आचरण, व्यवहार के विरूद्ध ढाल और हमारी जबावदेही और कत्र्तव्य निर्वहन की धार पर निर्भर करेगा विचार हमें करना है। 

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