वोट और वर्चस्व नीति से गांव, गली का भला होने वाला नहीं खुशहाली, समृद्धि की सार्थकता स्वराज से संभव यंत्र से अनभिज्ञ तंत्र-मंत्र की सार्थकता पर सवाल


व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जिस तरह से हमारी सरकारें सत्तायें यंत्र को विसार, तंत्र-मंत्र पर अधिक निर्भर नजर आती है उससे स्पष्ट है कि जिस विश्व विरादरी का सिरमोर बन हम हमारी समृद्ध, खुशहाल विरासत के लिए संघर्षरत है। उसे तभी हासिल किया जा सकता है कि जब हम काॅरपोरेट कल्चर से इतर यंत्र पर विचार करे, न तंत्र-मंत्र के सहारे लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल और विश्व विरादरी का सिरमौर बनने का असफल प्रयास करें। 
जीवन में अस्तित्व की जंग सार्थक हो सकती है। मगर सफल नहीं जो समझने वाली बात है। जिस तरह से यंत्र अर्थात प्रतिमा का तिरस्कार कर मशीनरी और उसकी गतिविधियों के सहारे हर संभव निदान की कोशिश हो रही वह कभी पूरी होने वाली नहीं। कारण काॅरपोरेट कल्चर जहां लाभ-हानि अहम होता है और आशा-आकांक्षाओं का कोई अस्तित्व नहीं।  

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