दलों का दंश और दम तोड़ता लोकतंत्र गिरोहबन्द संस्कृति में कलफते विद्या, विद्ववान
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस व्यवस्था में विद्या, विद्ववान ही नहीं, प्रतिभायें अवसर के अभाव में दम तोड़ने पर मजबूर हो उस व्यवस्था व उसे स्वीकार कर उस विधान का पालन करने वालों के लिए यह समझने वाली बात स्वयं के निहित स्वार्थ त्याग, होनी चाहिए। क्योंकि जिन आशा-आकांक्षाओं के साथ लोग अभावग्रस्त, समस्याग्रस्त हो मुफलिसी का जीवन जीने पर मजबूर है।
अगर स्वयं क्षणिक स्वार्थ या अज्ञानता बस लोकतंत्र के नाम, गिरोहबन्द लोग अर्थ संस्कृति के चलते इसी तरह सत्तासीन होते रहे, तो यह सच है कि ऐसे में उन आशा-आकांक्षाओं का भला नहीं होने वाला जो पथराई आंखों से अपने कल्याण को टकटकी लगाए देख रही है।
जय स्वराज

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