कत्र्तव्य विमुखता के बीच, प्रवचनों का सैलाब प्रमाण, प्रमाणिकता, सार्थक, सिद्धता, सृष्टि और जीवन के लिए अहम अंग सच से दूर सन्तुष्टि की तलाश


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
मंच, जनसेवा, लोक-सभा, जनसभा, धर्म-सभा, संगठन सभा या फिर सत्ता सामार्थ जनों की हो। मगर आजकल जिस तरह से कत्र्तव्य विमुखता के माहौल के बीच सुधारात्मक प्रवचनों का सैलाब आया है। वह किसी भी, सभ्य, समाज, संगठन, सत्ता, संस्थानों के लिए दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक भी होना चाहिए।
जिन समर्थ, सत्ता, संगठन, संस्थाओं के कंधों पर सृजन, कल्याण के बीच सेवा, निर्वहन का भार हो, जिनका दायित्व सृजनात्मक, समृद्ध, संरक्षित, संस्कार पूर्ण माहौल, सार्थक विषय वस्तुओं का निर्माण हो। जिनके सम्बर्धन से प्राकृतिक बौद्धिक, सपंदायें, प्रतिभाओं में निखार निर्माण के अवसर समान सहज हो। ऐसी सत्ता, संगठन, संस्थायें, समर्थ लोगों का प्रकृति के विरूद्ध कत्र्तव्य विमुख विलाप किसी भी व्यवस्था में उचित नहीं माना जा सकता। 
देखा जाए तो देश में विद्या, विद्यवान, प्रतिभाओं, न ही संसाधनों की कोई कमी है, न ही कत्र्तव्य निर्वहन पर सीमा, न ही जबावदेह जीवन निर्वहन पर बन्दिस, जो जीवन की सार्थकता सफलता ही नहीं, उसकी प्रमाणिकता सिद्ध करने काफी है। मगर यह तभी संभव है। जब हम अपने प्राकृतिक, बौद्धिक, शारीरिक समर्थ अनुसार अपने कत्र्तव्य जबावदेहियों का निर्वहन करें। क्योंकि सृष्टि में मौजूद जीवन के लिए सृजन, समृद्धि, खुशहाली अहम होती है। जिसे नैसर्गिक सिद्धान्त, व्यवहार अनुरूप प्राप्त कर स्वयं की जीवन उपायदेयता सिद्ध की जा सकती है। कहते है कि सामर्थ से संसाधन, वैभव और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से जीवन को सफल सिद्ध किया जा सकता है। बशर्ते लक्ष्य सृजन कल्याण से इतर न हो। 
जय स्वराज 

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