सेवाभावी संस्कृति में स्वार्थवत सत्ता उन्मुखी संस्कृति का प्रार्दुभाव सेवा के नाम, मलाई का संघर्ष, सत्ता का बड़ा संकट सर्वकल्याणकारी शिक्षा, संस्कृति, समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए अहम


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जिस भयाभय दौर में, हमारी स्वार्थवत नवनिर्मित संस्कृति, शिक्षा जा पहुंची है वह अब हमारी  उस महान संस्कृति के अस्तित्व को खतरा और इस मायूस बैवस राष्ट्र जन के लिए खतरनाक है। जिस महान संस्कृति पर कभी हम गर्व कर, स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करते थे और विश्व विरादरी में जो हमारी पहचान थी। मगर हमारे परतार्थी स्वभाव और सूतखोर संस्थाओं के आगे हमारी सत्ताओं के समर्पण ने विगत 7 दशक में हम स्वाभिमानी सुसंस्कृत राष्ट्र जन को कहीं का नहीं छोड़ा। जिसके दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। वह भी तब की स्थिति में जबकि हमारे संरक्षण, सम्बर्धन, समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए हमारे द्वारा हर 5 वर्ष में चुनी जाने वाली सेवाभावी कल्याणकारी सरकारें, सत्ता, संगठन और हमारे द्वारा पोषित इन सत्ता, सरकारों, संगठन, संस्थाओं को संचालित करने वाले हमारे बीच के ही हमारे अपने लोग है। 
मगर फिर भी आज हम जीवन्त, स्पर्शी, दीर्गकालिक, कल्याणकारी, सृजनात्मक, संस्कारिक शिक्षा देने में अक्षम, असफल साबित हो रहे है। परिणाम कि समृद्धि, खुशहाली, सहज जीवन को तरसते हम और हमारे लोग प्रकृति प्रदत्त, स्वच्छंद जीवन के मोहताज है। जबकि प्राकृतिक, बौद्धिक, शारीरिक, कौशल युक्त, संपदा प्राचुर मात्रा में हमारे पास होने के बावजूद आखिर क्यों यह विचार, सत्ता, सरकार, संस्थाओं, संगठनों में बैठे उन समर्थ लोगों के संज्ञान का विषय या चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता। यह समूचे राष्ट्र जन और प्रबुद्ध नागरिकों के लिए समझने वाली बात होना चाहिए। जो समृद्ध, खुशहाल जीवन के साथ स्वयं और राष्ट्र का सेवा कल्याण चाहते है। 
जय स्वराज

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