खुशहाल, समृद्ध, जन राष्ट्र के लिए समझ अहम अहम, अंहकार, मूड़धन्यता, महत्वकांक्षाओं का दंश झेलता समृद्ध देश प्रतिभा, विघा, विद्ववानों के दमन से कराहते लोग
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
बेजान अर्थ संस्कृति मे तब्दील, संस्कारिक, समृद्ध समाज अपने जन राष्ट्र कल्याण को इस तरह कलफेगा, जहां प्रतिभा, विघा, विद्ववानों को, राष्ट्र जन कल्याण के लिए न तो कोई अवसर नहीं स्थान होगा। कारण बेजान अर्थ संस्कृति मे तब्दील समाज स्वार्थवत गिरोहोंबंद सत्ताये, संस्कृति का लोकतांत्रिक व्यवस्था मे हावी होना हैं। जिस राष्ट्र, व्यवस्था मे त्याग, तपस्या, कल्याण की संस्कृति, संस्कारों को त्याग लोग स्वयं के स्थापित सत्ता उन्मुखी साम्राज्य, संख्या, धन, बल के सहारे स्वयं के स्वार्थ सिद्ध करते हो, जहां सियासत सरेआम, प्रतिभा, विधा, विद्ववानों के दमन पर उतारू हो उसे किसी भी सभ्य, समाज या व्यवस्था मे उचित नहीं कहा जा सकता। मगर यह कटु सच आज हम सबके सामने हैं।
कहते है किसी भी व्यवस्था मे सृदृढ़, समृद्ध, शसक्त लोगों की जबावदेही, अधिक होती है। जिनके कंधों पर प्रकृति, मानव, जीव, जगत, पशु , कल्याण का भार होता है। उनका कर्त्तव्य होता है कि वह अपनी प्राकृतिक संपदा जीव जगत सहित मानव कल्याण मे अपना अमूल्य योगदान दे। मगर दुर्भाग्य कि अपनो के ही बीच आशा आकांक्षायें दम तोड़ने पर मजबूर हैं। जो भीड़ तंत्र मे समझने वाली बात है। अगर आज भी हम इस कटु सच को समझने मे असफल, अक्षम साबित हुए तो बेहतर भविष्य की कल्पना बैमानी होगी।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
बेजान अर्थ संस्कृति मे तब्दील, संस्कारिक, समृद्ध समाज अपने जन राष्ट्र कल्याण को इस तरह कलफेगा, जहां प्रतिभा, विघा, विद्ववानों को, राष्ट्र जन कल्याण के लिए न तो कोई अवसर नहीं स्थान होगा। कारण बेजान अर्थ संस्कृति मे तब्दील समाज स्वार्थवत गिरोहोंबंद सत्ताये, संस्कृति का लोकतांत्रिक व्यवस्था मे हावी होना हैं। जिस राष्ट्र, व्यवस्था मे त्याग, तपस्या, कल्याण की संस्कृति, संस्कारों को त्याग लोग स्वयं के स्थापित सत्ता उन्मुखी साम्राज्य, संख्या, धन, बल के सहारे स्वयं के स्वार्थ सिद्ध करते हो, जहां सियासत सरेआम, प्रतिभा, विधा, विद्ववानों के दमन पर उतारू हो उसे किसी भी सभ्य, समाज या व्यवस्था मे उचित नहीं कहा जा सकता। मगर यह कटु सच आज हम सबके सामने हैं।कहते है किसी भी व्यवस्था मे सृदृढ़, समृद्ध, शसक्त लोगों की जबावदेही, अधिक होती है। जिनके कंधों पर प्रकृति, मानव, जीव, जगत, पशु , कल्याण का भार होता है। उनका कर्त्तव्य होता है कि वह अपनी प्राकृतिक संपदा जीव जगत सहित मानव कल्याण मे अपना अमूल्य योगदान दे। मगर दुर्भाग्य कि अपनो के ही बीच आशा आकांक्षायें दम तोड़ने पर मजबूर हैं। जो भीड़ तंत्र मे समझने वाली बात है। अगर आज भी हम इस कटु सच को समझने मे असफल, अक्षम साबित हुए तो बेहतर भविष्य की कल्पना बैमानी होगी।
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