न जमीन, न आसमान कैसे होगा जनकल्याण प्रधानमंत्री जी की नियत निष्ठा पर सवाल बैमानी

व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
कहते है कि अंग्रेजों ने जब पहली मर्तवा दिल्ली पर जीत हासिल कर, दिल्ली की सड़कों पर विजय जुलूस निकाला तो सड़कों के आजू-बाजू मौजूद लोग तालियां बजा रहे थे। कारण जो भी रहे हो, मगर सुख, दुख में शामिल होने की संस्कृति और पुरूषार्थ का सम्मान शायद इस भू-भाग का नैसर्गिक संस्कार रहा है। 
आज स्वार्थवत लोगों के रहते इस महान भू-भाग का यहीं महान संस्कार शायद हमारी महान संस्कृति के उतराधिकारियों के लिए आज की निर्मम राजनीति में नासूर साबित हो रहा है। 
जिस तरह से भ्रामक मार्केटिंग के सहारे गिरोहबन्द टीमें सत्ता सुख भोगने और सत्ता हासिल करने, मत के माध्यम से इस महान राष्ट्र को कमजोर कर, स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाने आतुर है वह शायद हमारे महान संस्कार की कमजोरी ही है। मगर जिस तरह की चर्चा आज आम है कि प्रधानमंत्री की निष्ठा, नियत, त्याग, तपस्या पर सवाल सिर्फ बैमानी ही हो सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सियासी सवाल होना स्वभाविक है। मगर तथ्य हीन सवाल इस सियासी संग्राम में सम्पूर्ण सत्य नहीं। 
सम्पूर्ण सत्य यह है कि 1971 के बाद या तो 1985 या फिर 2003, 2005 में पूरी क्षमता के साथ पुरूषार्थ हुआ या फिर देश का नेतृत्व 2014 के बाद पुरूषार्थ के लिए तैयार हुआ। जो पूरी क्षमता के साथ परिणाम को आतुर दिखा। मगर अहम, अहंकार महत्वकांक्षाओं मे बटी सियासत के चलते प्रधानमंत्री पर जिस तरह से सवाल-जबाव हो रहे है वह भविष्य की सियासी संस्कृति के लिए उचित नहीं। यहीं यक्ष सवाल आज समूचे राष्ट्र के सामने है। 
बेहतर हो इस राष्ट्र-जन के कल्याण और उसका भला करने वाले इस महान राष्ट्र के जन के सामने आज स्वयं की सार्थकता, सफलता सिद्ध कर, स्वयं को सक्षम साबित करने का सवाल है। अगर तथ्य विहीन सवालों पर मत हासिल करने की संस्कृति सियासी गलियारों में यूं ही परवान चढ़ती रही, तो मूल्य सिद्धान्त जनाधार विहीन लोग मार्केटिंग और हमारे नैसर्गिक संस्कारों के सहारे लाभ उठा सत्ता सुख भोग स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाते रहेगें। जो हम महान भारत वासियों पर ही एक शर्मनाक सवाल होगा। 
देखा जाये तो जिस तरह से फैले-फूटे, लुटे, बिखरे राष्ट्र को एक कर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल शास्त्री, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी, मनमोहन सिंह ने अब अपनी द्रण इच्छा शक्ति का परिचय दें, राष्ट्र निर्माण उसकी सुरक्षा सार्थकता और सिद्धता साबित की, उसी तरह आज देश के प्रधानमंत्री की भी सार्थकता आज सिद्ध है। 
ये अलग बात है कि कभी पं. नेहरू का गुट निरपेक्ष, पंचशील के सिद्धान्त के साथ उघोग, निर्माण, विकास, सामाजवाद तथा शास्त्री जी की हरितक्रान्ति, इन्दिरा जी की जनसंख्या नियंत्रण गरीबी हटाओं और 71 के युद्ध जैसी क्षमताऐं राजीव गांधी के कम्प्यूटर, आॅटोमोबाईल क्रान्ति के साथ नगरीय पंचायतीराज की अवधारणा के साथ श्रीलंका, मालदीप के संबंध में लिए गए सहासिक निर्णय जिसकी कीमत उन्होंने खुद की जान देकर चुकाना पड़ी। वहीं अटल जी की स्वर्णयम चर्तुभज, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सहित कारगिल, वहीं डाॅ. मनमोहन सिंह के समय परमाणु संधि, रोजगार, सूचना, शिक्षा, भूमि, खाद्य के संवैधानिक अधिकारों की श्रृंखला प्रधानमंत्रियों के योगदान समझने काफी है। तोे आज नरेन्द्र मोदी के रूप में देश के प्रधानमंत्री ने विदेश नीति, व्यापार और मुद्रा उज्ज्वला, आयुष्मान, स्वच्छता, कौशल विकास, आवास जैसी योजनाऐं आम लोगों को सीधे लाभ देने के साथ सरकार के खजाने को भरने नोटबन्दी, जीएसएसटी जैसे कदम के अलावा उनके द्वारा लिए जाने वाले साहसिक निर्णय की सराहना अवश्य होना चाहिए। फिर परिणाम जैसे भी रहे हो। मगर एक सार्थक, सफल उम्मीद सियासी संग्राम के बीच में देश को अवश्य होना चाहिए। मगर जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप दबाव और झूठे प्रचार की संस्कृति और भावनाओं के दोहन के लिए प्रचलित है। खासकर उस लोकतंत्र में जिसके नेताओं ने बड़े-बड़े उदाहरण नैतिकता के प्रस्तुत किए हो। फिर चाहे वह डाॅ. राममनोहर लोहिया, लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण के अलावा कई ऐसे नेता रहे हो। जिन्होंने स्वार्थ सत्ता और सरकारों से अपनी नैतिकता राष्ट्र व जन के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखा। यह देश के युवा बच्चों को समझने वाली बात होना चाहिए कि हम किस सियासत, संस्कृति और महान नेताओं के उतराधिकारी है। 
जय स्वराज 

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