बच्चे भविष्य नहीं, भाग्य विधाता बच्चों में सिमटा भूत, वर्तमान, भविष्य राष्ट्र-जन, हास परिहास, स्वार्थवत सत्ताओं का केन्द्र नहीं, बल्कि यह किसी भी भू-भाग का मान-सम्मान, स्वभिमान होता है जब भी इस महान भू-भाग पर संकट रहा बच्चों का मार्गदर्शन, पुरूषार्थ ही सारथी रहा है
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। दुर्भाग्य बस, अहम, अहंकार, स्वार्थवत लोग, मान-सम्मान, स्वाभिमान और इस महान राष्ट्र में जो देख सुन पढ़ रहे है। वह न तो इस महान भूभाग की नियति रही है, न ही यर्थात है। सच क्या है आज इस महान राष्ट्र के उतराधिकारी, बुजुर्ग, युवा, बच्चों को समझने वाली है, हो सकता है बुजुर्ग वंश मोह, युवा बेहतर भविष्य, सपनो के मोह में न समझ, सोच सके।
मगर इस महान राष्ट्र के बच्चों से न उम्मीद होना बैमानी होगी। अगर यो कहे कि यहीं इस महान राष्ट्र के महान भाग्य विधाता होगें इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। अगर हजारों, सैकड़ों वर्ष बाद भी यह राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा है। वह इस महान राष्ट्र के बच्चों का ही पुरूषार्थ है। मगर संदेह का सवाल आज इसलिए यक्ष है कि सियासत, सत्ता जिस तरह से गिरोहबन्द, सियासत का शिकार हो अपने-अपने निहित स्वार्थ, अहम, अहंकार अस्तित्व की जंग में डूब चुकी है। उससे सफल सार्थक परिणामों की उम्मीद रख समृद्ध, खुशहाल जीवन की कल्पना करना बैमानी है।
अगर यों कहे कि देश की सियासत सीधे तौर पर दो धु्रवो में बट चुकी है। जहां एक धु्रव वैचारिक आधार पर राष्ट्र-जन की खातिर साम, नाम, दण्ड, भेद के सहारे अपने वैचारिक सपनों को पूर्ण करना चाहता है। तो वहीं दूसरा ध्रुव राष्ट्र-जन के कल्याण के नाम अपना अस्तित्व बचा राष्ट्र-जन को समझ अपनी सुविधा अनुसार अपना कत्र्तव्य निर्वहन अपने संसाधन, सामर्थ के बल पर करना चाहता है। सम्भवतः इस महान राष्ट्र के लिए उसकी प्रकृति अनुसार दोनों ही स्थिति खतरनाक है। अगर इस महान राष्ट्र के बारे में किसी को कोई गलत फैहमी है तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि यह राष्ट्र अनादिकाल से समृद्ध, खुशहाल रहा है। जिसकी आवो-हवा की गोद में सृजन, विनाश दोनों खेलते रहे है, जिसमें सफल सृजन ही रहा है।
अगर प्राकृतिक सिद्धान्त, व्यवहार को उसकी आदत समझ, कोई इस महान राष्ट्र को बैवस बैहाल समझ, भावनाओं का देश मान इसका दोहन करना चाहता है। तो वह छणिक सफल तो हो सकता है। मगर वह इस महान भू-भाग पर अज्ञानता बस सार्थक सिद्ध कभी नहीं हो सकता और न ही यह कभी सम्भव रहा है और न ही होगा। जो आध्यात्म में आस्था रखते है वह समझ सकते है जो विज्ञान को सफल, सार्थक मानते है उनके सामने मौजूद भारतवर्ष के रूप में परिणाम सामने है। भारतवर्ष अपने महान संस्कार बस छणिक बैवस बेहाल हो सकता है, मगर मायूस मजबूर कदाचित नहीं, इतिहास गवाह है कि हम अनादिकाल से अपने संस्कार पुरूषार्थ के बल पर हमेशा सफल, सार्थक सिद्ध होते रहे है और भविष्य में भी सार्थक सिद्ध सफल होते रहेगें। ये अलग बात है कि एक शसक्त, सक्षम, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र निर्माण में बाधाऐं आयेगीं, जायेगीं। मगर जीत हमारे बच्चों के अध्यात्म पुरूषार्थ से हमारी ही होगी।
जय स्वराज
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