अन्धी हिंसा सार्थक नहीं, संगठित स्थाई समाधान, समय की दरकार

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है कि समस्या जब अनन्त दिखे और समाधान कोसो दूर, ऐसे में वैचारिक निदान ही सार्थक, सफल रहता है। जिस तरह की अंधी हिंसा वैचारिक आधार पर अपनी जड़े गहरी करती जा रही है वह मानवीय सभ्यता और इन्सानियत के हक में कतई नहीं। फिर भूभाग जो भी हो। अगर इसका स्थाई और सार्थक समाधान ढूंढना है, तो हमें संगठित रूप से सृष्टि की सार्थकता और सृजन के मार्ग पर अपनी क्षमताओं के साथ आगे बढ़ना होगा। आज जिस तरह की अंधी खूनी हिंसा विभिन्न भू-भागों पर मत या आवेश बस हो रही है। जिसमें मानव सभ्यता, जीव, जगत का कत्लेयाम हो रहा है। उससे आज तक न तो किसी को कुछ हासिल हो सका है और न ही भविष्य में कुछ हासिल होने वाला है।  
कहते है मानव सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है जो सफल, सार्थक, सृजन में सक्षम है। जिसके कन्धों पर समृद्ध, खुशहाल जीवन की जबावदेही होती है और सांस्कारिक रूप से एक ऐसे समाज विचार, सभ्यता, स्थापित कर, जो सृजन ही नहीं, समृद्ध, खुशहाल जीवन में सार्थक सिद्ध हो सके। उसी मानवीय कृति का आज आतंक के रास्ते कत्लेयाम उस मानव सभ्यता पर कलंक है। जो सृजन के लिए अस्तित्व में होती है और जिससे लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल बनता है। आज जरूरत मानवीय ही नहीं, प्रकृति, जीव-जगत के लिए सृजन में आस्था रखने वाले लोगों को उस विचार के साथ संगठित होने की है। जहां हिंसा जैसे वैचारिक आधार को कोई स्थान न हो और व्यवस्थागत ऐसे विचार और व्यक्तियों को निस्तानाबूत किया जा सके। जो मानवीय सभ्यता के लिए कलंक है। जिनकी न तो सृष्टि, सृजन और सर्व कल्याणकारी संस्कारों में कोई आस्था है और न ही विश्वास। मगर हमेशा से भारतवर्ष की संस्कृति, संस्कार, विचारों ने हमेशा इन पर जीत हासिल की है और करती रहेगी। जरूरत संगठित हो स्थाई समाधान की ओर अग्रसर होने की है। 
जय स्वराज 

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