सार्थक राष्ट्र-जन, चिन्तन के आभाव की कीमत चुकाता समृद्ध राष्ट्र सत्ता संचालन में आध्यात्म, पुरूषार्थ अहम


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
90 का दशक आते-आते राष्ट्र-जन के सार्थक, चिन्तन के खात्मे के साथ समरस्ता, सेवा, समृद्धि, विकास के नाम स्वार्थवत सत्ताओं का देश में जो दौर शुरू हुआ 2014 आते-आते तक भले ही उसे विराम मिला हो। मगर यह देश आज भी सक्षम, सफल, समृद्ध नहीं बन सका। फिर कारण जो भी रहे हो। 
ऐसा नहीं कि देश में 1989 से लेकर 2014 के बीच कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि छणिक प्रयास, सेवा, विकास, कल्याण के नाम सत्ताओं के लिए तो अवश्य प्रयास हुए। मगर वह सत्तायें न तो लोगों को सहज, सरल, सुरक्षित, समृद्ध, संस्कारिक जीवन दे सकी और वह सर्वकल्याण में भी अक्षम और असफल साबित हुईं। परिणाम कि एक स्वाभिमानी संस्कारिक, समृद्ध, राष्ट्र में नैतिक पतन तथा गहरी जड़े जमा चुका भ्रष्टाचार तथा स्वार्थवत लोगों का भोले-भाले लोगों पर लोकतंत्र के नाम अघोषित साम्राज्य स्थापित होता रहा। 
देखा जाये तो गिरोहबन्द दलों में तब्दील तथाकथित दल, संगठन, समूह, लोकतंत्र के नाम दम तोड़ती जनाकांक्षाऐं इस बात का प्रमाण है कि अब आशा-आकांक्षाओं का न तो कोई भाव रहा, न ही उसका कोई मोल। अगर देश में सार्थक राष्ट्र-जन के लिए पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ आध्यात्म, चिन्तन हुआ होता, तो कलफते गांव, गली के गरीब भोले-भाले संस्कारिक लोगों के देश में हजारों, लाखों, करोड़ के घपले-घोटाले न होते, न ही वेमतलब के मसलों पर वर्ग संघर्ष के निशान। ऊरी, पुलवामा, छत्तीसगढ़ में हुए जघन्य हत्याकाण्डों जैसे गृणयात्मक कृत्य भी न होते, न ही इस महान राष्ट्र का चरित्र प्रभावित होता और न ही उसका स्वाभिमान, संस्कार, स्वार्थवत सत्ताओं के मोहताज। जो किसी भी सफल, सक्षम, समर्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम कलंक ही कहे जायेंगे। 
अब ऐसे में यक्ष सवाल यहीं है कि राष्ट्र व जन के बीच मौजूद इन जघन्य समस्याओं का स्थाई समाधान क्या है ? अगर हम महान भारतवर्ष के लोग इन जघन्य समस्याआंे का स्थाई समाधान चाहते है, तो हमें, हमारे नैसर्गिक गुण, महान संस्कृति, आध्यात्म, पुरूषार्थ पर लौटना होगा। जिससे हम यह तय कर सके कि जीवन में सत्य और यथार्थ क्या है और कौन-से विकल्प हमें सर्वोत्तम साबित हो सकते है। जिसके लिए हमारा वैचारिक आधार ही अचूक शस्त्र साबित होगा। जिसके लिए हमें सर्वोत्तम विकल्प के साथ निर्णायक पुरूषार्थ भी करना होगा। तभी हम समाधान तक पहुंच सकते है जो हमारे आध्यात्म और पुरूषार्थ को सार्थक सिद्ध करने में सहायक होगा और इस तरह के जघन्य कृत्यों से हमें निजात दिलायेगा। 
बेहतर हो कि हम अपने महान अतीत को साक्षी मान सृजन के मार्ग पर सृष्टि अनुसार सार्थक, सटीक शुरूआत करे। आज हमें यहीं समझने वाली बात होना चाहिए।   
जय स्वराज 

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