स्वार्थवत, गिरोहबंद सियासी संस्कृति की जकड़ में जनतंत्र सच साबित होती सैकड़ों वर्ष पुरानी आशंका
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
पूर्वी-पश्चिमी संस्कृति के फेर में सफर करता समृद्ध,खुशहाल जीवन इतना बैवस बदहाल होगा स्वार्थवत, गिरोहबन्द सत्ताओं और गिरोहबन्द सियासी संस्कृति के बीच शायद सृष्टि रचियता तथा सियासत, सत्ता, संस्कृति, संस्कार निर्माताओं ने भी न सोचा होगा।
यूं तो सैंकड़ों वर्ष तक भारत ही नहीं, समूचे विश्व के अधिकांश राज्य देशों पर कभी अपना साम्राज्य स्थापित करने वाली वृतानियां हुकूमत ने भी न सोचा होगा कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को उसने भी समय-समय पूरी समझ-बूझ के बाद स्वयं को सक्षम बना, जनतांत्रिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था को आत्मसात किया। जिसे वह पूर्वी देशों में कई बार लोकतंत्र की मांग होने के बावजूद उस मांग को दरकिनार कर, लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना से कतराता रहा। क्योंकि वह जानते थे कि न तो पूर्वी भू-भाग की आवो-हवा, आचरण, संस्कार अपने विधान को त्याग नवनिर्मित संवैधानिक व्यवस्था को आत्मसात कर पायेगें और न ही ऐसे देशों में वृतानियां हुकूमत लोकतांत्रिक व्यवस्था का सफल संचालन कर पायेगें।
परिणाम कि हम एक लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद सफल, संचालन में बैवस मजबूर है। मजबूर वह बिलखता बैवस राष्ट्र और लोग भी है। जिन्होंने जाने-अनजाने में अपने नेताओं पर भरोसा व्यक्त कर, लिखित उस संविधान को आत्मसात कर अपने महान विधान संस्कृति की कीमत पर उसे अंगीकार किया। आज उस महान राष्ट्र और उस राष्ट्र के महान नागरिकों की बैवसी बदहाली स्वार्थवत सत्ताओं, गिरोहबन्द सियासी संस्कृति की जीती-जागती मिशाल है। आज न तो इस महान राष्ट्र के शिक्षा, संस्कृति ही अपने मूर्तरूप में रह सके, न ही संसाधन, संरक्षण के साथ वह अवसर ही सहज रहे। जिससे लोग अपना भविष्य बेहतर रूप से गढ़ अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन खुलेयाम कर सके। अवसर को तरसती मानव शक्ति आज बैवस बेहाल ही नहीं, सहज संसाधनों की मोहताज भी है।
जब तक हम भारतवर्ष के लोग अपने नैसर्गिक स्वभाव सृजन अर्थात मेडिन के लक्ष्य को निर्धारित कर उसे आत्मसात कर अपने बच्चे, युवा, बुजुर्ग जीवन निर्वहन के उस महान मार्ग पर नहीं लौटते जिसके लिए भारतवर्ष को पहचाना जाता है। तब तक हम स्वार्थवत सत्ताओं और गिरोहबन्द सियासी संस्कृति का यूं ही शिकार होते रहेगें। जागना होगा हम स्वाभिमानी राष्ट्र के समृद्ध, खुशहाल पूर्वजों के वंशजों को तथा स्वयं के स्वार्थ त्याग और इन्टरनेट पर मौजूद सियासी षड़यंत्रों को समझ सत्य और स्वयं के साथ सृष्टि के सरोकारों को समझने की है। तभी हम एक शसक्त स्वाभिमानी, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र बन पायेगें।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
पूर्वी-पश्चिमी संस्कृति के फेर में सफर करता समृद्ध,खुशहाल जीवन इतना बैवस बदहाल होगा स्वार्थवत, गिरोहबन्द सत्ताओं और गिरोहबन्द सियासी संस्कृति के बीच शायद सृष्टि रचियता तथा सियासत, सत्ता, संस्कृति, संस्कार निर्माताओं ने भी न सोचा होगा। यूं तो सैंकड़ों वर्ष तक भारत ही नहीं, समूचे विश्व के अधिकांश राज्य देशों पर कभी अपना साम्राज्य स्थापित करने वाली वृतानियां हुकूमत ने भी न सोचा होगा कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को उसने भी समय-समय पूरी समझ-बूझ के बाद स्वयं को सक्षम बना, जनतांत्रिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था को आत्मसात किया। जिसे वह पूर्वी देशों में कई बार लोकतंत्र की मांग होने के बावजूद उस मांग को दरकिनार कर, लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना से कतराता रहा। क्योंकि वह जानते थे कि न तो पूर्वी भू-भाग की आवो-हवा, आचरण, संस्कार अपने विधान को त्याग नवनिर्मित संवैधानिक व्यवस्था को आत्मसात कर पायेगें और न ही ऐसे देशों में वृतानियां हुकूमत लोकतांत्रिक व्यवस्था का सफल संचालन कर पायेगें।
परिणाम कि हम एक लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद सफल, संचालन में बैवस मजबूर है। मजबूर वह बिलखता बैवस राष्ट्र और लोग भी है। जिन्होंने जाने-अनजाने में अपने नेताओं पर भरोसा व्यक्त कर, लिखित उस संविधान को आत्मसात कर अपने महान विधान संस्कृति की कीमत पर उसे अंगीकार किया। आज उस महान राष्ट्र और उस राष्ट्र के महान नागरिकों की बैवसी बदहाली स्वार्थवत सत्ताओं, गिरोहबन्द सियासी संस्कृति की जीती-जागती मिशाल है। आज न तो इस महान राष्ट्र के शिक्षा, संस्कृति ही अपने मूर्तरूप में रह सके, न ही संसाधन, संरक्षण के साथ वह अवसर ही सहज रहे। जिससे लोग अपना भविष्य बेहतर रूप से गढ़ अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन खुलेयाम कर सके। अवसर को तरसती मानव शक्ति आज बैवस बेहाल ही नहीं, सहज संसाधनों की मोहताज भी है।
जब तक हम भारतवर्ष के लोग अपने नैसर्गिक स्वभाव सृजन अर्थात मेडिन के लक्ष्य को निर्धारित कर उसे आत्मसात कर अपने बच्चे, युवा, बुजुर्ग जीवन निर्वहन के उस महान मार्ग पर नहीं लौटते जिसके लिए भारतवर्ष को पहचाना जाता है। तब तक हम स्वार्थवत सत्ताओं और गिरोहबन्द सियासी संस्कृति का यूं ही शिकार होते रहेगें। जागना होगा हम स्वाभिमानी राष्ट्र के समृद्ध, खुशहाल पूर्वजों के वंशजों को तथा स्वयं के स्वार्थ त्याग और इन्टरनेट पर मौजूद सियासी षड़यंत्रों को समझ सत्य और स्वयं के साथ सृष्टि के सरोकारों को समझने की है। तभी हम एक शसक्त स्वाभिमानी, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र बन पायेगें।
Comments
Post a Comment