गलतियों से सीख, सफलता की सीढ़ी न तो प्रभावी मुद्दे, वक्ता, न ही जनाधार मार्केटिंग के भंवर में मचा कोहराम
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है, गलतियों से सीख सफलता की कुंजी होती है। मगर जब गलतियां से सीख न ले उन्हें बार-बार दोहराया जाये तो विनाश सुनिश्चित होता है। जिसका समूचा अस्तित्व सीख, समझ पर निर्भर करता है। मगर जब रणनीतकार, सलाहकार, स्वार्थी, महत्वकांक्षी हो तो सुधार की गुजांइस न के बराबर होती है। लगभग ऐसा ही देश के महान संगठन काॅग्रेस के साथ हो रहा है। बरना 2014 की करारी हार से वह सीख लेती। मगर ऐसा हो न सका, न तो विगत 4 वर्षो में काॅग्रेस प्रखर वक्ता जनाधार वाले नेता, ज्वलंत मुद्दे, न ही राष्ट्र को समर्पित सत्याग्रही वैचारिक लोगों वह जोड़ सकी।
आज जिन 3 राज्यों की हालिया जीत को काॅग्रेस अपना हुनर बता रही है। वह भी सिर्फ और सिर्फ एक अहंकारी सत्ता का विकल्प जनता ने दिया है। अब उसे आम मतदाता की मजबूरी कहे या फिर काॅग्रेस नाम पर विश्वास। बरना जिस गिरदावरी, जागीरदारी में बटे दल के क्षत्रपों में चलती रस्सा-कसी से यह सफलता उसे कभी नसीब नहीं होती।
जिस जनता की जीत के रथ पर सवार काॅग्रेस के रणनीतकार अब उ.प्र. ही नहीं, देश को फतह करना चाहते है। उन्हे समझना होगा कि इस संग्राम को जीतने मजबूत जमीन ही नहीं, जज्बा, जीवन्त नेतृत्व और ज्वलंत मुद्दों की जरूरत होती है न कि मार्केटिंग के बल जीत का मुगालता पालने की। बहरहाल बगैर जनाधार ज्वलंत मुद्दे सहित प्रभावी वत्ताओं के जिस नीव पर काॅग्रेस उ.प्र. में खड़ी हो रही है उससे बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं। क्योंकि जिन कमियों के चलते काॅग्रेस उ.प्र. ही नहीं, समूचे देश में जिस मुकाम पर खड़ी है जब तक उन्हें दुरूस्त नहीं कर लिया जाता, तब तक सारे प्रचार-प्रसार प्रयास बैमानी है। बेहतर हो कि काॅग्रेस व्यवहारिकता के धरातल पर बेहतर प्रदर्शन के लिए अपना मूल हुनर दिखाये और ज्वलंत मुद्दे अच्छे वक्ता जनाधार सहित सही रणनीतकार और राष्ट्र तथा समाजसेवियों को सामने लेकर आये, तभी सम्भव है अस्तित्व की जंग में जीत।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है, गलतियों से सीख सफलता की कुंजी होती है। मगर जब गलतियां से सीख न ले उन्हें बार-बार दोहराया जाये तो विनाश सुनिश्चित होता है। जिसका समूचा अस्तित्व सीख, समझ पर निर्भर करता है। मगर जब रणनीतकार, सलाहकार, स्वार्थी, महत्वकांक्षी हो तो सुधार की गुजांइस न के बराबर होती है। लगभग ऐसा ही देश के महान संगठन काॅग्रेस के साथ हो रहा है। बरना 2014 की करारी हार से वह सीख लेती। मगर ऐसा हो न सका, न तो विगत 4 वर्षो में काॅग्रेस प्रखर वक्ता जनाधार वाले नेता, ज्वलंत मुद्दे, न ही राष्ट्र को समर्पित सत्याग्रही वैचारिक लोगों वह जोड़ सकी। आज जिन 3 राज्यों की हालिया जीत को काॅग्रेस अपना हुनर बता रही है। वह भी सिर्फ और सिर्फ एक अहंकारी सत्ता का विकल्प जनता ने दिया है। अब उसे आम मतदाता की मजबूरी कहे या फिर काॅग्रेस नाम पर विश्वास। बरना जिस गिरदावरी, जागीरदारी में बटे दल के क्षत्रपों में चलती रस्सा-कसी से यह सफलता उसे कभी नसीब नहीं होती।
जिस जनता की जीत के रथ पर सवार काॅग्रेस के रणनीतकार अब उ.प्र. ही नहीं, देश को फतह करना चाहते है। उन्हे समझना होगा कि इस संग्राम को जीतने मजबूत जमीन ही नहीं, जज्बा, जीवन्त नेतृत्व और ज्वलंत मुद्दों की जरूरत होती है न कि मार्केटिंग के बल जीत का मुगालता पालने की। बहरहाल बगैर जनाधार ज्वलंत मुद्दे सहित प्रभावी वत्ताओं के जिस नीव पर काॅग्रेस उ.प्र. में खड़ी हो रही है उससे बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं। क्योंकि जिन कमियों के चलते काॅग्रेस उ.प्र. ही नहीं, समूचे देश में जिस मुकाम पर खड़ी है जब तक उन्हें दुरूस्त नहीं कर लिया जाता, तब तक सारे प्रचार-प्रसार प्रयास बैमानी है। बेहतर हो कि काॅग्रेस व्यवहारिकता के धरातल पर बेहतर प्रदर्शन के लिए अपना मूल हुनर दिखाये और ज्वलंत मुद्दे अच्छे वक्ता जनाधार सहित सही रणनीतकार और राष्ट्र तथा समाजसेवियों को सामने लेकर आये, तभी सम्भव है अस्तित्व की जंग में जीत।
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