पावर, प्रदर्शन से अहम प्रतिभा, स्वाभिमान, संरक्षण अहिंसा से बड़ा दुनिया मेें कोई अचूक अस्त्र नहीं- व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक स्वराज


धर्मेन्द्र सिंह
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
व्यक्ति, परिवार, समाज जब अपनी संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ, संस्कार जैसे अस्त्रों से लैस हो, तो न तो उसे कोई अस्त्र न ही कोई राष्ट्र किसी भी संघारत, घातक अस्त्र से परास्त कर सकता है, न ही वह भविष्य का खतरा बन सकता है। यहीं हम भारतवर्ष के लोगांे का सामर्थ और पहचान रही है। इस महान भू-भाग का मान-सम्मान, स्वाभिमान ही हमेशा से इस राष्ट्र की सार्थकता और संघारक क्षमता रही है। जिसके आगे न तो अर्थ, समाज, राजनीति, विज्ञान का कोई अर्थ अस्तित्व रहा है, न ही उनकी कभी सार्थकता, सिद्धता, सफलता साबित हुई है, यहीं आज हर भारतवासी को समझने वाली बात होना चाहिए।
आज के वक्त स्वयं के सामर्थ और सत्ता की नीत-नियत पर संदेह स्वयं की पहचान पर ही एक सवाल है। इसलिए हमें स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने स्वयं के सामर्थ का प्रदर्शन करना चाहिए और स्वार्थवत होने वाले सियासी सवालों को दरकिनार कर, उनका तिरस्कार करना चाहिए। यहीं एक सच्चे, सफल नागरिक का कत्र्तव्य होना चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र में सबसे बड़ी जबावदेही जब हालात संस्कृति, संस्कार विरूद्ध शिक्षा और स्वास्थ के अभाव में हो। तब युवा, बुजुर्गो के बजाये बच्चों की जबावदेही अधिक होती है। जिसकी सिद्धता इसी महान भू-भाग पर भगवान राम, कृष्ण और भक्त ध्रुव के रूप में साक्षी रही है और सिद्ध भी हुई है। हम अपने आराध्य एवं अपनी विरासत से सीख लेते हुए खुदीराम बोस, सुभाषचन्द्र बोस और शिवाजी जैसे राष्ट्र भक्तों को क्यों भूल जाते है। जिन्होंने अपने जीवन में त्याग-तपस्या, शिक्षा, स्वास्थ, संस्कारों के बल स्वयं की सार्थकता भी और सिद्धता भी सिद्ध की है और दुनिया को परिणाम दें, अपने सामर्थ का भी एहसास कराया। 
अगर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत संस्कृति से सींख ले, सृष्टि में सृजन और कल्याण की खातिर अहिंसा के अस्त्र को सिद्ध करने में सार्थक हुए तो यह हमारी सबसे बड़ी सफलता होगी। जिसका उपयोग गांधी, भगतसिंह सहित विभिन्न राष्ट्र भक्तों ने अपनी-अपनी समझ अनुसार किया। क्योंकि प्रकृति में अहिंसा, त्याग, तपस्या ही वह अचूक-अस्त्र है जिसे शिक्षा, स्वास्थ, संस्कार, संस्कृति के बल सिद्ध कर, सृष्टि के दुश्मनों का संहार किया जा सकता है। जिसके प्रमाण वर्तमान, भूत में है और भविष्य को भी वह प्रमाणिक करेगंे। यहीं भारतवर्ष की समृद्ध, सशक्त, खुशहाल विरासत का मूल मंत्र रहा है यह न तो हमारे युवा, बुजुर्ग, बच्चों को भूलना चाहिए, न ही हमें अपने कत्र्तव्य, जबावदेहियों से विमुख होना चाहिए। यहीं भारतवर्ष की सफलता, सिद्धता और अनादिकाल से सामर्थ रहा है। 
जय स्वराज  

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