सृजन में चिन्ताओं का सार्थक, स्वीकार्य, समाधान, शिक्षा, समाधान और सिद्धता से सम्भव है चिन्तन की सिद्धता, स्वीकार्य सार्थक, समाधान पर निर्भर स्थापित शिक्षा, संस्कृति, संस्कार अहम


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
सृष्टि, सृजन में जीव, जगत, मानव कल्याण को लेकर चिन्तन अनादिकाल से रहे है। मगर उनकी सिद्धता हमेशा स्वीकार्य समाधान में ही निहित रही जिसमें स्थापित शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों की हमेशा से अहम भूमिका रही। मगर सबकुछ उस चिन्तन की सिद्धता, सार्थकता पर निर्भर रहा जिसे शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों के माध्यम से मूर्त देने का प्रयास हुआ। सृष्टि में सृजन यूं तो अपने आप में एक शिक्षा है जो संस्कृति, संस्कारों का आधार है। बशर्ते वह नैसर्गिक स्वरूप अनुसार सहज स्वीकार्य हो और जिसने अपने मन, वचन, कर्म, आचरण, व्यवहार बस अपने नैसर्गिक गुणों का निष्ठा पूर्वक निर्वहन किया हो। 
क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सृष्टि में मौजूद जीव, जगत, मानव अपने-अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृजन के लिए इस सृष्टि में मौजूद है। कहते है परिवर्तन प्रकृति का नियम है और समृद्ध, खुशहाल जीवन अन्तिम लक्ष्य। इसलिए चिन्तन में लक्ष्य तो सार्थक सिद्ध स्पष्ट हो ही साथ ही उसे प्राप्ति के मार्ग भी उत्तम होना चाहिए जिसकेे लिए शिक्षा, संस्कृति, संस्कार अहम है और यहीं चिन्तन की सिद्धता है। 

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