हलकट सियासत, हलाक लोकतंत्र


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
एक सभ्य सुसंस्कृत समाज में सेवा कल्याण, सम्प्रभूता स्वाभिमान के नाम जिस तरह की तथ्य विहीन स्वार्थवत, साम्राज्यवादी सत्ती की लकीरे खींची जा रही है। वह भी हलकट सियासत और संस्कार विहीन, संस्कृति के सहारे वह शर्मनाक तो है ही और दर्दनाक तथा किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक भी है। हलाकान है वह महान लोकतांत्रिक परम्परायें जिसके बल पर कभी हमें गर्व होता था और हम महान संस्कृति, भू-भाग के उत्तराधिकारी, समृद्ध, खुशहाल समाज के वंशज स्वयं को गौराविन्त भी मेहसूस करते थे। 
क्योंकि तब हमारे मार्गदर्शी बन्धु, परिवार जन, मुखिया लिखित आचार संहिता न होने बावजूद, परम्पराओं उच्च संस्कृति, संस्कारों का पालन कर समाज में ऐतिहासिक कीर्तिमान त्याग-तपस्या कर अपने बान्धव बन्धुओं की सेवा कल्याण व मातृ-भूमि के प्रति निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कर सर्वकल्याण को सर्वोपरि मानते थे। आज लिखित आचरण संहिता संविधान एवं लिखित लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के बावजूद सत्ता के लिए जिस तरह से तथ्य विहीन हलकट नजीरे सिर्फ स्वार्थ और सत्ता साम्राज्य बनाये रखने या बढ़ाने के लिए गिरोहबंद तरीके हो रही है। उसके चलते वह लोकतांत्रिक मान्यता भी हलाकान होने के कगार पर है। जिसकी समृद्धि का बखान करते आज हम नहीं थकते।
देखा जाये तो जिस तरह से सत्य के साक्षी स्वार्थवत संस्कारों का समाज में जो प्रादुर्भाव हो रहा है तथा सत्ता से सेवा कल्याण और सत्ता के लिए लोकतांत्रिक परम्पराओं का दमन हो रहा है शायद इसे दुरूस्त करने का समय आ चुका है और यह महान कार्य अब इस समाज का महान नागरिक ही कर सकता है। वह भी अपने लोकतांत्रिक कत्र्तव्यों का निष्ठापूर्ण निर्वहन करके इतिहास गवाह व्यवस्था जो भी हो रही हो। नेतृत्व जिसका भी रहा हो। वह कितना ही सामर्थ, समृद्धशाली क्यों न रहा हो। मगर जनता ने समय-समय पर अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर अपने पुरूषार्थ के बल यह साबित किया है कि वह जागरूक भी है और समृद्ध, सुसंस्कृत शिक्षित संस्कृति के वंशज भी है।
जय स्वराज

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