माफियाराज से कराहता लोक और तंत्र


धर्मेन्द्र सिंह 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
अगर देश, प्रदेश को छोड़, देश के एक छोटे के जिले में ही धन पिपासुओं से माफियाराज का आलम देखे तो जिस तरह से कानून की आड़ में अघोषित रूप से जनधन की उगाई चल प्राकृतिक संपदा की लूट मची है वह किसी से छिपी नहीं। सच और झूठ का प्रमाण तो जबावदेह वह संवैधानिक संस्थायें या पदों पर बैठे वह जबावदेह लोग ही दे सकते है। जिनकी जबावदेही प्राकृतिक संपदा की लूट और कानून की आड़ में हो रही अवैध उगाई को रोकना है।
कौन नहीं जानता कि जिस तरह से म.प्र. के शिवपुरी जिले की नदियों से उनका सीना छलनी कर, पनडुब्बी, पाॅकलेन जेसीबी के माध्यम से छलनी किया जा रहा है और आये दिन छापेमारी और फिर अवैध उत्खनन के समाचार सुर्खियां बनते है। सच तो ये है रेत के अवैध माफियाराज का कि जो रेत का डम्फर आज से दो-चार वर्ष पहले 7-8 हजार रूपया प्रति डम्फर बाजार में बिकती थी। आज उसकी कीमत लगभग 24 हजार रूपया प्रति डम्फर हो चुकी है।
म.प्र. के परिवहन विभाग के चैक पोस्टो का आलम भी कुछ कम नहीं, जहां आये दिन अवैध बसूली या परिवहन टैक्स चोरी के चर्चे आम रहते है। कारण साफ है कि जिस तरह की प्रक्रिया परिवहन विभाग में चैक पोस्टों को लेकर अपनाई जाती है या नवगठित सरकार के समय थोकबंद लोगों की पदस्थापना, पद गरिमा के विपरीत की गई है यह सच समझने काफी है। अगर आचार संहिता के दौरान आयोग निष्पक्ष छापेमारी करा, अपने शासन का एहसास स्वच्छ निर्वाचन के पूर्व कराना चाहता है तो इस पर निर्वाचन आयोग को निष्ठापूर्ण संज्ञान अवश्य लेना चाहिए जो उसका अधिकार भी है और आचार संहिता के दौरान उसकी मौजूदगी का एहसास भी। देखना होगा कि सुर्खियां बनती खबरों पर आयोग किस तरह से संज्ञान लेता है। 

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